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चेन्नई में जन्मे ‘बेंगलुरू के बेटे’ पूर्व-IPS भास्कर राव कैसे कर्नाटक में AAP को बढ़ावा देंगे

खबर 30 दिन-
  • आईपीएस में 32 वर्ष की सेवा के बाद, जिसमें उन्होंने बेंगलुरू पुलिस आयुक्त और एडीजीपी के पदों पर काम किया और कुछ विवादों में भी फंसे, भास्कर राव इस हफ्ते आम आदमी पार्टी में शामिल हो गए.

बेंगलुरू: सितंबर 2021 में जब उन्होंने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति स्कीम (वीआरएस) का विकल्प चुना, तो आईपीएस अधिकारी भास्कर राव राजनीति में दाखिल होने की सोच रहे थे और अपने विकल्प तोल रहे थे.

उनके सामने दो रास्ते थे- या तो कांग्रेस जो फिलहाल विपक्ष में है, या फिर आम आदमी पार्टी (आप), जो उस समय तक पंजाब में कांग्रेस की प्रमुख विरोधी बन चुकी थी और अपनी मौजूदगी का राष्ट्रीय स्तर पर विस्तार करना चाहती थी.

रिटायर होने के दो दिन बाद सोमवार 4 अप्रैल तक, 1990 बैच के कर्नाटक काडर के अधिकारी ने अपना विकल्प चुन लिया- पूर्व अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (एडीजीपी) आप में शामिल हो गए.

हालांकि राव मुख्यधारा की राजनीति में औपचारिक रूप से अभी आए हैं लेकिन उनके राजनीति की दुनिया में दाखिल होने की संभावनाओं की सुगबुगाहट एक साल से अधिक से चल रही है. जून 2020 में कर्नाटक कांग्रेस के हलकों में काफी तेज़ अटकलें थीं कि उनके दक्षिण बेंगलुरू से 2023 के विधानसभा चुनाव लड़ने की संभावनाएं बन सकती हैं.

राव ने खबर 30 दिन को बताया कि अपना विकल्प चुनने से पहले, न केवल कांग्रेस बल्कि भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने भी उन्हें लुभाने की कोशिश की थी.

उन्होंने कहा, ‘मैं अपनी पूरी जिंदगी कर्नाटक में रहा हूं और मेरे मित्र सभी राजनीतिक पार्टियों में हैं. कांग्रेस और बीजेपी दोनों से बहुत लोगों ने मुझे उनकी पार्टियों में शामिल होने के लिए कहा है.’

आप में ऐसा क्या था जिसने उन्हें आकर्षित किया?

राव ने  कहा, ‘मुझे लगता है कि आप एक ऐसी पार्टी है जिसपर कोई बोझ लदा हुआ नहीं है’.


आम आदमी पार्टी में क्यों आए राव

पिछले महीने पंजाब में अपनी ज़बर्दस्त जीत से उत्साहित आप, अपनी पहुंच को विस्तार देकर आगे हिमाचल, गुजरात, और कर्नाटक जैसे सूबों में ले जाना चाहती है. इसका मतलब है कि उसे भास्कर राव जैसे बड़े-बड़े लोगों से संबंध रखने वाले और लोकप्रिय चेहरों की ज़रूरत है.

आप के प्रदेश संयोजक पृथ्वी रेड्डी ने  कहा, ‘उन्होंने (राव) राज्य की सेवा की है और लोगों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को साबित किया है’.

नेता ने कहा कि राव का पार्टी में शामिल होना सिर्फ एक शुरुआत है. कर्नाटक में 224 विधानसभा सीटें हैं और अगले साल होने वाले चुनावों में ज्यादा से ज्यादा उम्मीदवार खड़े करना चाहती है.

रेड्डी ने कहा, ‘हमारे पास पहले से ही एक बहुत सफल दिल्ली मॉडल है. हमें स्थानीय और भरोसेमंद लोगों की जरूरत है जो उसका अनुकरण कर सके’.

राव ने खुद को एक सच्चा बेंगलूरियन बताया. उन्होंने कहा, ‘मैं बासवनागुड़ी में रहा और पला-बढ़ा, जयनगर में पढ़ाई की, मेरे सभी दोस्त मालेश्वरम में हैं और मेरे परिवार के बहुत से लोग पद्मानाभनगर में हैं’.

चेन्नई में जन्मे राव ने बहुत से शहरों के अलग-अलग स्कूलों में पढ़ाई की. 57 वर्षीय राव जयानगर के नेशनल कॉलेज के एक भूतपूर्व छात्र हैं और उनके पास बेंगलुरू यूनिवर्सिटी से मास्टर्स डिग्री है. अपने छात्र दिनों में एनसीसी कैडट रहे राव को युद्धक्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय शांति व्यवस्था में उनकी सेवाओं के लिए यूएन पदक मिल चुका है.

अगस्त 2019 से 2020 के बीच वो बेंगलुरू के पुलिस आयुक्त रहे, जिसके लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा ने उन्हें आलोक कुमार की जगह चुना था, जिन्हें एचडी कुमारस्वामी की पिछली जनता दल (सेक्युलर)-कांग्रेस गठबंधन सरकार ने नियुक्त किया था, जो मात्र 47 दिन सत्ता में रही थी.

हालांकि राव ने अपना अधिकतर जीवन दक्षिण बेंगलुरू और मालेश्वरम में बिताया है लेकिन वो अभी किसी जगह से बंधे नहीं रहना चाहते.

उन्होंने कहा, ‘मेरे लिए अभी किसी एक जगह पर लंगर डालना जल्दबाज़ी होगी. पूरा कर्नाटक मुझपर भरोसा करता है’.

राव साइकिल चलाने के शौकीन हैं और अक्सर बड़ी खुशी के साथ साइक्लाथॉन्स में अपने भाग लेने की बातें करते हैं.

हालांकि उन्होंने वीआरएस का विकल्प चुना- वो स्कीम जिसमें कोई व्यक्ति सेवानिवृत्ति की अपनी आधिकारिक तिथि से पहले रिटायर हो सकता है लेकिन उन्हें पिछले हफ्ते ही सेवा से मुक्त किया गया क्योंकि मुख्यमंत्री बासवराज बोम्मई की अगुवाई वाली कर्नाटक की बीजेपी सरकार उन्हें अपना इस्तीफा वापस लेने के लिए मनाने की कोशिश कर रही थी. राव का कार्यकाल पूरा होने में अभी तीन साल बाकी थे.

कांग्रेस में कुछ लोग भास्कर राव के आप में शामिल होने को अपनी पार्टी के लिए नुकसान मानते हैं. एक कांग्रेस पदाधिकारी ने स्वीकार किया कि राव दक्षिण बेंगलुरू के बासवनागुड़ी से चुनाव लड़ना चाहते थे लेकिन पार्टी इससे सहमत नहीं हुई.

बासवनागुड़ी बीजेपी का मज़बूत गढ़ है और यहां ब्राह्मणों की एक अच्छी खासी आबादी है- जो राव का अपना समुदाय है.

कांग्रेस नेता ने  कहा, ‘ये कांग्रेस पार्टी के लिए नुकसान है. वो बेंगलुरू में बहुत कीमती साबित हो सकते थे’.

आप के बारे में बात करते हुए राव ने कहा, ‘इसमें कोई आलाकमान कल्चर नहीं है, जो हर छोटी गतिविधि को नियंत्रित करने की कोशिश करती है’. उन्होंने आगे कहा, ‘आप सांप्रदायिक राजनीति नहीं करती’.

कांग्रेस का नुकसान आप का फायदा है. पार्टी कर्नाटक में अपेक्षाकृत अज्ञात है, जिसके पास स्थानीय निकाय चुनावों में मुठ्ठी भर सीटें हैं. पार्टी को उम्मीद है कि अब वो राव की लोकप्रियता को भुना पाएगी.

रेड्डी ने कहा, ‘(आप की) पंजाब जीत के बाद देश भर के लोग पार्टी को एक उम्मीद की किरण और बदलाव के प्रतीक के तौर पर देख रहे हैं. विभिन्न राज्यों में हमारे विकास के लिए जरूरी है कि स्थानीय, भरोसेमंद और जनता के प्रिय लोग पार्टी की जिम्मेदारी लें. भास्कर ऐसे ही एक व्यक्ति हैं. कोविड-19 के दौरान उन्होंने पुलिस बल की सराहनीय ढंग से अगुवाई की, जिस समय सरकार तकरीबन गायब थी’.

2020 में कोविड लॉकडाउन को लागू कराने में राव की भूमिका की आलोचना और प्रशंसा दोनों हुईं. लेकिन विभाग के भीतर उन्हें एक सज़ा न देने वाले लीडर के तौर पर देखा जाता है.

बेंगलुरू सेंट्रल के पुलिस उपायुक्त एमएन अनुचेथ ने कहा, ‘राव एक ‘दिलदार’ व्यक्ति हैं. वो सज़ा पर आधारित प्रदर्शन में नहीं, बल्कि नयेपन और बदलाव में विश्वास रखते हैं. हमारे विभाग में ऐसा लीडर बहुत मुश्किल से नज़र आता है, जो अपने मातहतों को खुली छूट देता हो’.


फोन-टैपिंग विवाद

राव का करियर विवादों से अछूता नहीं रहा है. अगस्त 2019 में कथित रूप से राव और एक सत्ता के दलाल के बीच हुई फोन बातचीत के लीक होने से सत्ताधारी बीजेपी और जनता दल (सेक्युलर) के बीच अवैध फोन-टैपिंग को लेकर विवाद खड़ा हो गया, जिस पर करीब 300 फोन लाइनें टैप कराने का आरोप लगा था, जब वो एचडी कुमारस्वामी की अगुवाई में सत्ता में थी.

फोन बातचीत कथित रूप से राव के बेंगलुरू कमिश्नर पद के लिए समर्थन जुटाने को लेकर थी.

उस कथित बातचीत में शामिल तथाकथित सत्ता का दलाल बाद में एक पॉन्जी स्कीम का संदिग्ध निकला.

लीक हुई फोन बातचीत को लेकर राव और उनके पूर्ववर्ती आलोक कुमार के बीच टकराव की स्थिति पैदा हो गई. राव ने कुमार पर अवैध तरीके से उनका फोन टैप करने और उन्हें बदनाम करने की कोशिश का आरोप लगाया.

राज्य सरकार ने, जिसकी कमान उस समय तक येदियुरप्पा के हाथ में आ चुकी थी, इस मामले की जांच सीबीआई के हवाले कर दी.

सीबीआई की ‘बी’ रिपोर्ट फाइल होने के बाद, जिसमें कहा गया था कि जांच को आगे बढ़ाने का कोई आधार नहीं था, राव ने उसे चुनौती दी जिसके नतीजे में एक विशेष सीबीआई अदालत ने रिपोर्ट को खारिज करके, फिर से जांच के आदेश दे दिए.

राव ने कहा कि वो अब इस विवाद से आगे बढ़ जाना चाहते हैं.

आप में शामिल होने के बाद राव ने कहा, ‘मैं पुलिस विभाग की राजनीति को आगे नहीं बढ़ाना चाहता. मैं माफ करने और भूल जाने में विश्वास रखता हूं’.

बेंगलुरू पुलिस आयुक्त रहते हुए भी विवादों ने उनका पीछा नहीं छोड़ा. पूर्व उपमुख्यमंत्री सीएन अश्वथनारायण ने, जो अब उच्च-शिक्षा, सूचना प्रौद्योगिकी व बायोटेक्नॉलजी और विज्ञान एवं टेक्नोलॉजी मंत्री हैं, उन पर 2020 में लॉकडाउन के दौरान ई-कॉमर्स कंपनियों से रिश्वत लेने का आरोप लगाया था.

भावुक हो गए राव बीच में ही बैठक छोड़कर निकल आए थे, हालांकि येदियुरप्पा ने उन्हें शांत करने की कोशिश की थी.

लेकिन ऐसा लगता है कि इस तरह के आरोप से आप चिंतित नहीं है- एक ऐसी पार्टी जिसकी जड़ें उस भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन में हैं, जिसकी हवा 2011 में पूरे देश में चली थी.

पृथ्वी रेड्डी ने कहा, ‘वो पिछले सप्ताह तक सेवा में थे. अगर सरकार के पास उनके खिलाफ भ्रष्टाचार का कोई सबूत होता, तो किसी ने उसे कार्रवाई करने से नहीं रोका. ये बात ही एक पर्याप्त संकेत है कि ऐसे आरोप राजनीतिक हमलों से ज्यादा कुछ नहीं होते’.


सत्ता में सिविल सर्वेंट्स

कर्नाटक में सिविल सर्वेंट्स का अपनी सेवा बीच में छोड़कर राजनीति में दाखिल होना कोई नई बात नहीं है. कुछ सिविल सर्वेंट्स रिटायर होने के बाद ये कदम उठाते हैं.

तमिलनाडु के मौजूदा बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष के अन्नामलाई, कर्नाटक काडर के एक आईपीएस अधिकारी थे जब 2019 में उन्होंने सेवा छोड़ी.

कर्नाटक के कृषि मंत्री बीसी पाटिल एक पूर्व पुलिस अधिकारी से एक्टर बने नेता हैं जो बाद में राजनीति में आए. पूर्व लोकसभा सदस्य एचटी सांग्लियाना आईपीएस अधिकारी से राजनीति में आने वाले शायद राज्य के सबसे प्रसिद्ध राजनेता हैं.

आईजीपी और कर्नाटक राज्य हस्तशिल्प विकास निगम (केएचडीसी) की एमडी रूपा डी ने  कहा, ‘नौकरशाह आईएएस और आईपीएस अधिकारी बनने के लिए पढ़ाई और मेहनत करते हैं और उन्हें आमतौर पर तेज़ी से तरक्की करने वालों के तौर पर देखा जाता है’.

जब अधिकारी लोग राजनेताओं को ज़बर्दस्त ताकत इस्तेमाल करते हुए देखते हैं और देखते हैं कि वो किसी भी तरीके को अपनाकर काम निकलवा लेते हैं, तो एक नौकरशाह को लगता है कि शासन के अपने अनुभव के साथ, ये काम वो खुद क्यों नहीं कर सकते’.

रूपा ने कहा कि ये सब अपनी-अपनी पसंद की बात होती है. उन्होंने आगे कहा, ‘इसके लिए हम उनसे ईर्ष्या नहीं कर सकते’.

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