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जिग्नेश मेवाणी को ज़मानत, कोर्ट ने कहा- पुलिस ने हिरासत में रखने को गढ़ा छेड़छाड़ का झूठा मामला

गुजरात से विधायक जिग्नेश मेवाणी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आलोचना करने वाले ट्वीट से संबंधित मामले में ज़मानत मिलने के तुरंत बाद असम पुलिस की एक महिला कर्मचारी से कथित तौर पर छेड़छाड़ करने के आरोप में गिरफ़्तार किया था.

जिग्नेश मेवाणी. (फोटो साभार: फेसबुक)

नई दिल्लीः असम की सत्र अदालत के न्यायाधीश ने शुक्रवार को जिग्नेश मेवाणी को जमानत देते हुए कहा कि गौहाटी हाईकोर्ट को राज्य में पुलिस की ज्यादतियों पर अंकुश लगाने के लिए उनके आदेश पर जनहित याचिका के रूप में विचार करना चाहिए.

असम पुलिस ने गुजरात से विधायक मेवाणी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आलोचना करने वाले ट्वीट से संबंधित मामले में जमानत मिलने के तुरंत बाद महिला पुलिसकर्मी से कथित तौर पर छेड़छाड़ करने के आरोप में गिरफ्तार किया था.

बारपेटा के मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी मुकुल चेतिया ने मेवाणी को जमानत देने से इनकार करते हुए उन्हें 26 अप्रैल को पांच दिनों की पुलिस हिरासत में भेज दिया था.

इसके बाद मेवाणी ने 28 अप्रैल को नई जमानत याचिका दायर की थी, जिस पर सुनवाई के बाद उन्हें जमानत मिल गई.

अदालत ने अपने आदेश में कहा, ‘कोई भी समझदार शख्स दो पुरुष पुलिसकर्मियों की मौजूदगी में किसी भी महिला पुलिसकर्मी से बदतमीजी नहीं करने की कोशिश नहीं करेगा. रिकॉर्ड में ऐसा कुछ भी दर्ज नहीं है, जिससे पता चले कि आरोपी जिग्नेश मेवाणी पागल हैं.’

जज अपारेश चक्रवर्ती ने यह भी कहा कि कानून पुलिस हिरासत में दिए गए बयानों को सबूत के तौर पर मानने की मंजूरी नहीं देता.

बारपेटा जिला एवं सत्र न्यायाधीश अपरेश चक्रवर्ती ने जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान पिछले एक साल में हुईं पुलिस मुठभेड़ों का उल्लेख करते हुए गौहाटी हाईकोर्ट से आग्रह किया कि वह राज्य पुलिस बल को खुद में सुधार करने का निर्देश दें.

बोरा ने कहा, ‘सत्र अदालत ने यह भी कहा कि यह आदेश राज्य के सभी पुलिस थानों में भेजा जाना चाहिए ताकि एक आरोपी को एक स्थान से दूसरे स्थान ले जाने के दौरान पुलिस यात्रा को इलेक्ट्रॉनिक तरीके से रिकॉर्ड कर सके.’

मेवाणी के वकील ने कहा कि उन्हें पहले मामले से जुड़ी औपचारिकताओं को पूरा करने के लिए कोकराझार वापस ले जाया जा सकता है और उसके बाद रिहा किया जाएगा. बोरा ने कहा कि इसमें एक दिन का समय लग सकता है.

बता दें कि पहले मामले में जमानत मिलने के बाद मेवाणी को 25 अप्रैल को दोबारा गिरफ्तार किया गया था.

मेवाणी ने दोबारा गिरफ्तारी के तुरंत बाद कहा था, ‘यह भाजपा और आरएसएस की साजिश है. उन्होंने मेरी छवि खराब करने के लिए ऐसा किया है. वह ऐसा व्यवस्थित रूप से कर रहे हैं. उन्होंने यह रोहित वेमुला, चंद्रशेखर आजाद के साथ भी किया था और अब वे मुझे निशाना बना रहे हैं.’

दूसरा मामला

मेवाणी पर दर्ज दूसरा मामला कोकराझार पुलिस स्टेशन में तैनात एक महिला सब इंस्पेक्टर की शिकायत पर आधारित है, जिनका आरोप था कि गुजरात विधायक मेवाणी ने उनके साथ छेड़छाड़ की और आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल किया.

मेवाणी के वकील बोरा ने अपने मुवक्किल की दोबारा गिरफ्तारी पर  बताया, ‘इस एफआईआर के बारे में कोई जिक्र तक नहीं था, कोकराझार पुलिस 24 अप्रैल की शाम तक निचली अदालत में उनकी जमानत याचिका का विरोध कर रही थी लेकिन जमानत मिलने के बाद इस नए मामले का जिक्र किया गया और कोकराझार मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने उन्हें रिमांड पर भेजा.’

मेवाणी पर आईपीसी की धारा 294 (सार्वजनिक स्थान पर अश्लील कृत्य), 323 (जानबूझकर स्वेच्छा से चोट पहुंचाना), 353  (लोक सेवक को उसके कर्तव्य के निर्वहन से रोकने के लिए हमला या आपराधिक बल) और 354 (महिला का शील भंग करने के इरादे से उस पर हमला या आपराधिक बल)  के तहत मामला दर्ज किया.

 प्राप्त एफआईआर की कॉपी में कहा गया है कि कोकराझार पुलिस स्टेशन की महिला पुलिसकर्मी ने 21 अप्रैल को बारपेटा रोड थाने में शिकायत दर्ज कराई थी, जिसमें कहा गया था कि वह कोकराझार मामले में आरोपी जिग्नेश मेवाणी को सरकारी वाहन से गुवाहाटी हवाईअड्डे से कोकराझार लेकर जा रही थीं. इस दौरान दो अन्य पुरुष पुलिसकर्मी भी मौजूद थे.

शिकायत में कहा गया, ‘रास्ते में दोपहर 1.30 बजे बारपेटा जिले का सिमलगुरी पॉइंट पार करने के बाद आरोपी शख्स ने मेरे खिलाफ आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल किया. जब मैंने उससे सही से व्यवहार करने को कहा तो उन्होंने और अधिक अपशब्द कहे. उन्होंने मुझे उंगली दिखाकर डराने की कोशिश की और पूरी ताकत से मुझे सीट पर धकेल दिया. उन्होंने लोकसेवक होने के नाते मेरे कानूनी कर्तव्यों को किए जाने के दौरान मारपीट की और धक्के के दौरान मुझे गलत तरीके से छूते हुए छेड़छाड़ की.’

महिला पुलिसकर्मी ने अपनी शिकायत में बताया कि इस घटना के दौरान एडिशनल पुलिस अधीक्षक सुरजी सिंह पनेसार और टीएसआई मोउटी बसुमतारी भी वाहन में ही थे.

कोकराझार और बारपेटा के पुलिस अधीक्षक थुबे प्रतीक विजय कुमार (आईपीएस) और अमिताभ सिन्हा (असम पुलिस सेवा) हैं.

पहला मामला

गुजरात के वडगाम विधानसभा क्षेत्र से निर्दलीय विधायक मेवाणी को सबसे पहले 20 अप्रैल की रात को कोकराझार की पुलिस की टीम ने गुजरात से हिरासत में लिया था. उन्हें भाजपा के एक नेता की शिकायत पर हिरासत में लिया गया था.

इसे लेकर आरोप लगाया गया था कि मेवाणी ने दो दिन पहले प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ एक ट्वीट किया था, जो दो समुदायों के बीच वैमनस्य को बढ़ावा देने वाला था.

असम के स्वायत्त बोडोलैंड क्षेत्रीय परिषद के भाजपा के कार्यकारी सदस्य अनूप कुमार डे ने कथित तौर पर पुलिस के समक्ष शिकायत कर कहा कि उन्होंने मेवाणी का एक ट्वीट देखा, जिसमें कहा गया था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गोडसे को भगवान मानकर उनकी पूजा करते हैं.

उन्होंने मोदी से हिम्मतनगर खंभात और वेरावल जैसे इलाकों में जनता से शांति और सौहार्द की अपील करने को कहा, जहां सांप्रदायिक हिंसा हुई थी.

बता दें कि मेवाणी की एक के बाद एक गिरफ्तारी को गुजरात विधानसभा चुनाव से पहले विपक्ष की आवाज को चुप कराने को सत्तारूढ़ भाजपा के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है.

मेवाणी की जमानत के बाद चिदंबरम ने असम के मुख्यमंत्री पर निशाना साधा

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी. चिदंबरम ने गुजरात के विधायक जिग्नेश मेवाणी के खिलाफ ‘झूठी प्राथमिकी’ दर्ज कराने को लेकर असम पुलिस को राज्य की अदालत की फटकार लगने के बाद शनिवार को मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा शर्मा पर निशाना साधा.

चिदंबरम ने पूछा कि क्या मुख्यमंत्री सीबीआई को यह पता लगाने की जिम्मेदारी देंगे कि किस ‘सनकी व्यक्ति’ ने मामले में प्राथमिकी दर्ज कराई.

पूर्व केंद्रीय गृहमंत्री ने सिलसिलेवार ट्वीट करते हुए कहा कि अदालत ने पाया कि इस बात का कोई सबूत नहीं है कि मेवाणी एक पागल व्यक्ति हैं.

उन्होंने लिखा, ‘यदि मेवाणी पागल नहीं हैं और फिर भी उनके खिलाफ झूठी प्राथमिकी दर्ज की गई थी, तो कोई तो पागल हुआ?’

चिदंबरम ने पूछा कि क्या असम के मुख्यमंत्री सीबीआई को यह पता लगाने के लिए मामला सौंपेंगे कि मेवाणी के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराने वाला पागल व्यक्ति कौन था?

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)

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