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नई तकनीक से लैस होंगी भूमिगत खदानें:कोल कटर मशीन से होगा खनन, नए साल में खुलेगी केतकी खदान

अंबिकापुर/बिश्रामपुर
SECL NEWS
  • रेहर और गायत्री में भी लगेंगी मशीनें बैकुंठपुर और कोरबा में हो रहा है इन मशीन का उपयोग
  • अंडरग्राउंड माइंस में होने वाली दुर्घटनाओं में जनहानि रोकने और कम समय में अधिक उत्पादन के लिए बिश्रामपुर क्षेत्र की खदानों में नई तकनीक का उपयोग किया जाएगा।

क्षेत्र की केतकी, रेहर और गायत्री खदान में कोल कटर मशीन से कोयले का उत्पादन किया जाएगा। अब तक यह मशीन बैकुंठपुर और कोरबा आदि जगहों पर उपयोग की जा रही हैं। कोयला खदानों में दुर्घटनाओं को रोकने, जान-माल की सुरक्षा करने और उत्पादन को बढ़ाने के लिए समय-समय पर नई-नई तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है। इसी क्रम में बिश्रामपुर क्षेत्र की भूमिगत खदानों में भी कोल कटर मशीन के माध्यम से कोयले का खनन किया जाएगा। वन विभाग से अनुमति मिलने के बाद जनवरी में खुलने जा रही केतकी खदान इस नई तकनीक से लैस खदान होगी। इसके अलावा रेहर और गायत्री खदानों में भी इस तकनीक का उपयोग होगा। अधिकारियों ने बताया कि खदान धंसने जैसी स्थिति होने पर खदान के अंदर मौजूद मजदूरों को जान का खतरा बना रहता है। वहीं कोयले को कमजोर करने विस्फोट किया जाता है। इससे विस्फोट के बाद खदान के अंदर का क्षेत्र प्रदूषित होता है। इस मशीन के उपयोग से यह समस्या नहीं होगी।

अधिक कोयला उत्पादन के साथ पूरी सुरक्षा
एसईसीएल के अधिकारियों ने बताया कि कटर मशीन से जहां एक ओर कोयले का अधिक उत्पादन होता है, वहीं जोखिम शून्य होता है। मशीन के कारण कम कर्मियों को खदान के अंदर जाना पड़ता है और खदान धंसने जैसी स्थिति भी कम होती है। कटर मशीन से उत्पादित कोयला पावर प्लांट के लिए अधिक उपयोगी होता है। कटर मशीन से कोयले का साइज छोटा रहता है। इस कारण सामान्य तौर पर बड़े-बड़े साइज में निकलने वाले कोयले को तोड़ने के लिए क्रेशर मशीन लगानी पड़ती है।

मशीन के उपयोग से कम होंगे रोजगार के अवसर
खदान में बड़े पैमाने पर प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से मजदूरों को रोजगार मिलता है। वहीं मशीन लगने के बाद कम ही रोजगार मिल पाएगा। जानकारों ने बताया मशीन नहीं होने की स्थिति में यदि एक शिफ्ट में 10 एसईसीएल के कर्मी और 100 ठेका मजदूर काम करने जाते हैं, तो कुल 110 लोगों को रोजगार मिलता है। यदि मशीन लगाई जाएगी तो ठेका मजदूरों की काफी हद तक जरूरत नहीं होगी।

मशीन से खनन होने पर घटेगी खदान की आयु
जानकारों ने बताया कि यह मशीन मजदूरों की अपेक्षा दोगुने से अधिक कोयले का खनन करती है। इससे जहां मजदूरों को रोजगार के अवसरों में कमी आएगी, वहीं खदानों की आयु भी कम होगी। मजदूरों से खनन कराने पर यदि कोई खदान 20 साल तक उत्पादन करती है तो मशीन से खनन होने पर 10 से 15 सालों में ही उसका कोयला खत्म हो जाएगा।

जानमाल की होगी सुरक्षा प्रदूषण से मुक्ति: जीएम
जीएम बीएन झा ने बताया कि केतकी अंडरग्राउंड माइंस नई तकनीक से लैस होगी। यहां कोल कटर मशीन लगाई जाएगी। इसके अलावा रेहर और गायत्री खदानों में भी यह मशीन लगेगी। मशीन से मजदूरों की जान-माल की सुरक्षा होगी और विस्फोट से होने वाले प्रदूषण से भी मुक्ति मिलेगी। खदान के अंदर का वातावरण भी धुंआ रहित होगा।

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