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मौत का सच बयां कर रहे ये दर्द भरे घड़े:गोरखपुर में एक पीपल के पेड़ पर बंधे 24 घड़े, लोग बोले- ऐसा कभी नहीं देखा, हर तीसरे घर में मातम

गोरखपुर
गोरखुर के शिवपुर सहबाजगंज में लगे पीपल के पेड़ पर लटके घड़े।

उत्तर प्रदेश के छोटे शहरों में कोरोना से मौत के सरकारी आंकड़े भले ही कम हो, लेकिन हकीकत कुछ और ही है। गोरखपुर के अधिकांश मोहल्लों में लगे पीपल के पेड़ इन दिनों घड़ों से भर गए हैं। उनमें जगह नहीं बची है कि और और घड़े बांधे जा सकें। लोगों का कहना है कि ऐसा इससे पहले कभी नहीं देखा गया है। लोगों का कहना है कि अधिकतर लोगों की मौत कोरोना से हुई है। पीपल के पेड़ के आसपास रहने वाले कितने लोगों की दस दिन के अंदर मौत हुई है, यह सबूत भी हैं और आकड़े भी। दर्द से भरे इन घड़ों में किसी के पिता तो किसी के बेटे की यादें हैं।

हिंदू रीति-रिवाज के मुताबिक किसी की मौत होने के बाद आत्मा की शांति के लिए पीपल के पेड़ पर एक घड़ा बांध दिया जाता है। इसमें दस दिनों तक रोज पानी दिया जाता है। पेड़ पर बंधे घड़े यह बताते हैं कि दस दिनों के अंदर आसपास कितने लोगों की मौत हुई है। गोरखपुर में अब शायद ही ऐसा कोई मोहल्ला हो, जहां इन दिनों पीपल का पेड़ खाली हो। कई मोहल्लों के पेड़ का हाल तो यह है कि पीपल पर घड़े लटकाने की जगह ही नहीं बची है।

शिवपुर सहबाजगंज मोहल्ले वालों का कहना है कि इनमें से अधिकांश मौतें कोरोना से हुई हैं। हर दिन एक-दो नए घड़े टांगे जा रहे हैं। वहीं, पीपल पर जगह नए घड़ों को टांगने के लिए दस दिन पूरा हो जाने वाले घड़ों को उतार दिया जा रहा है। ताकि नए घड़े लटकाए जा सकें। आलम यह है कि दो-चार घरों को छोड़ बाकी घरों में मौत का मातम छाया हुआ है।

पीपल पर घड़ा लटकाने की यह है मान्यता
पंडित रविशंकर पांडेय बताते हैं कि हिंदू संस्कृति में मृत्यु के बाद पीपल पर घड़े टांगने की परंपरा है। गरुण पुराण के मुताबिक पीपल को देवताओं का घर कहा जाता है। ऐसी मान्यता है कि पीपल के पेड़ पर देवताओं का वास होता है। मृत्यु के बाद जीव देवताओं की शरण के लिए भागते हैं। इसलिए मृत्यु होने के बाद एक घड़े को घर के पास किसी पीपल के पेड़ पर टांग दिया जाता है। इस घड़े की पेंदी (निचले भाग) में छेद कर दिया जाता है। जिससे बूंद-बूंद पानी पीपल की जड़ में जाता रहे। जिसने मुखाग्नि दी होती है, वह दस दिन तक हर सुबह पानी और शाम को तिल के तेल का दीपक जलाते हैं। ग्यारहवें दिन महाब्राहम्ण आते हैं, वे उस घड़े को फोड़ते हैं।

पीपल पर नहीं बची जगह
शहर के शिवपुर सहबाजगंज में पादरी बाजार पुलिस चौकी से पहले एक पीपल का पेड़ है। इस पेड़ पर इन दिनों घड़े टांगने की जगह ही नहीं बची है। पेड़ के चारो तरफ मिलाकर अभी 24 घड़े टंगे हुए हैं। मोहल्ले वाले बताते हैं कि ऐसा पहली बार देख रहे हैं कि पीपल के पेड़ पर जगह ही नहीं बची है। मोहल्ले में हर दिन किसी न किसी के मौत की खबर सुनने को मिल रही है। इनमें अधिकांश मौते कोरोना से हो रही हैं।

घड़ों से कैसे समझें मौतों का सच?
पं. रविशंकर पांडेय बताते हैं कि पीपल के पेड़ में घड़े सिर्फ उन्हीं मृतकों के लिए टांगे जाते हैं, जिनका अंतिम संस्कार सनातन रीति-रिवाज से हुआ हो। लेकिन आज के व्यस्ततम समय में अधिकांश मौतों में परिवार के लोग मृतक का अंतिम संस्कार आर्यसमाज रिति रिवाज से कर रहे हैं। आर्य समाज में सब कुछ तीन दिनों में ही खत्म हो जाता हैं। आर्य समाज के मुताबिक इसमें न दस दिनों का कर्मकांड होता है और न ही पीपल पर घड़े टांगे जाते हैं। चूंकि आर्य समाज में तीन दिनों में ही सभी रिवाज पूरे हो जाते, इसलिए अधिकांश लोग इसी रिवाज को अपनाते हैं। ऐसे में इन घड़ों से आसपास में हुई मौतों का आंकड़ा और सच काफी आसानी से समझा जा सकता है।

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