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UP से बेबसी की 2 कहानियां:10 लाख खर्च करने पर भी पिताजी नहीं बचे, अस्पताल वाले ऑक्सीजन निकाल देते थे; एक पत्नी ने जेवर गिरवी रखकर पति का अंतिम संस्कार किया

लखनऊ/गोरखपुर

ये दौर ऐसा है जिसमें हर कोई बेबस और लाचार ही दिख रहा है। अपनों की जिंदगी बचाने की जंग लड़ रहा है। कोई पति को कोई बेटे को लेकर एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल में दौड़ रहा है। किसी को ऑक्सीजन की जरूरत है तो किसी को वेंटिलेटर की। लाखों रुपए खर्च करने के बाद भी हर कोई इस सिस्टम के आगे हार जा रहा है। हम आपको ऐसे ही दो परिवारों की कहानी बतान जा रहे हैं, जिन्होंने अपनों को बचाने के लिए सब कुछ दांव पर लगा दिया, लेकिन फिर भी सिस्टम से जंग नहीं जीत पाए…

पहली कहानी: रात में न जाने कौन पापा की ऑक्सीजन निकाल देता था
हम तीन बहनें हैं। सबसे बड़ी प्रिया, फिर प्रियंका और फिर मैं यानी श्वेता। भले ही मैं अपनी कहानी बता रही हूं…लेकिन आज यही हालत लगभग हर उस मिडिल क्लास फैमली में है, जिनके यहां कोई कोरोना से संक्रमित है। आज तक मैं जिस सिस्टम का हिस्सा होने पर गर्व करती थी…उसी से हार गई। हम तीनों बहनों के सिर से पिता का साया उठ गया।

मेरे पापा की तबियत 9 अप्रैल को अचानक खराब हो गई थी। उन्हें लखनऊ के एक प्राइवेट हॉस्पिटल में हमने भर्ती किया। पहले ही दिन अस्पताल वालों ने डेढ़ लाख रुपए जमा करवा लिए। आखिरी तक करीब 6 छह लाख रुपए लिए। लगा अच्छा इलाज मिलेगा और पापा जल्द हम लोगों के बीच होंगे। हर रोज हम 32 हजार रुपए की दवाइयां अस्पताल वालों को देते।

दो-तीन दिन तो सब कुछ ठीक रहा, लेकिन बाद में पापा बताने लगे कि रात में कोई उनका ऑक्सीजन ही निकाल देता है। हम लोग हर रोज डॉक्टर से बात करने की कोशिश करते, लेकिन वे हमें डांटकर भगा देते थे। हम बहुत गिड़गिड़ाए। हाथ जोड़कर मिन्नत की, लेकिन किसी ने नहीं सुना। 12वें दिन हमें खबर दी गई थी पापा नहीं रहे।

दो घंटे पहले ही हम लोगों ने पापा से बात की थी। सब कुछ ठीक लग रहा था। ऑक्सीजन लेवल में भी सुधार हुआ था। अचानक क्या हुआ ये किसी को पता नहीं, लेकिन हम जानते हैं अगर किसी ने कुछ गलत किया है तो भगवान उसे कभी माफ नहीं करेगा। ऊपर वाला सबका हिसाब रख रहा है।

दूसरी कहानी: पति को बचाने के लिए सारे गहने गिरवी रखने पड़े, फिर भी लाश ही मिली

मेरा नाम रेखा श्रीवास्तव है। मैं गोरखपुर में रहती हूं। मेरे पति अमरेंद्र 20 अप्रैल को कोरोना से संक्रमित हो गए थे। दो दिन तक अस्पताल में कहीं बेड नहीं मिला। मैं अपनी 8 साल की बेटी और 12 साल के बेटे के साथ दर-दर भटकती रही। आखिरकार 22 अप्रैल को एक निजी अस्पताल में बेड मिल गया। अस्पताल वालों ने पहले 50 हजार रुपए लिए, फिर 70 हजार रुपए। लेकिन फिर भी वेंटिलेटर नहीं मिला। दो दिन में डेढ़ लाख रुपए खर्च करने के बाद भी अस्पताल से तीसरे दिन पति की लाश ही मिली।

बाहर निकलने पर भी मालूम चला कि यहां तो हर कोई लाश पर ही कमाई कर रहा है। किसी की लाश से कौन कितना लूट सकता है…यह पहली बार मैंने देखा। लाश को श्मशान घाट तक ले जाने के लिए कोई गाड़ी नहीं मिल रही थी। एंबुलेंस वाले को 10 हजार रुपए दिए तब जाकर वह माना। ये लूट यहीं खत्म नहीं हुई। श्मशान घाट पर 2 हजार की लकड़ी 5 हजार में मिली, अंतिम संस्कार कराने वाले ने भी 8 हजार रुपए लिए। मुझे नहीं मालूम कि ये सब सही है या गलत… इतना जरूर मालूम है कि भगवान इन सबका हिसाब करेगा।

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