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लोकवाणी में “कका” बन गए मुख्यमंत्री भूपेश बघेल, बच्चों-युवाओं को अपने भतीजे-भतीजी बताकर संबोधित किया

रायपुर( BBC LIVE)
  • मुख्यमंत्री की मासिक रेडियो वार्ता “लोकवाणी” की आज 18वीं कड़ी का प्रसारण हुआ है।

मध्य प्रदेश की राजनीति में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के लिए मामा संबोधन अब आम हो चुका है। कुछ इसी तरह का प्रयोग छत्तीसगढ़ में भी करने की कोशिश हो रही है। आज मासिक रेडियो वार्ता “लोकवाणी” में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल “कका” बन गए। उन्होंने बच्चों और युवाओं को भतीजे-भतीजी कहकर संबोधित किया।

मासिक प्रसारण में संबोधन की शुरुआत प्यारे बच्चों और युवा साथियों से करते हैं। लेकिन इस बार संबोधन से पहले वे रुक गए। माइक पर हाथ रखा और कहा, सोशल मीडिया में तो ये लोग मुझे “कका” ही कहते हैं। मैं भी इन्हें भतीजे-भतीजी ही बोलुंगा। उसके बाद उन्होंने ठेठ छत्तीसगढ़ी में कहा, “लोकवाणी के सुनइया सब्बोे सियान मन ला, दाई-दीदी मन ला, भतीजा-भतीजी मन ला अउ सब्बो संगवारी मन ला मोर डहर ले जय जोहार”। मुख्यमंत्री अक्सर जनता से संवाद में कनेक्ट की ऐसी कोशिश करते रहते हैं। कभी किसानों से बातचीत में उनके गांव के खेत-खार की पहचान के साथ हालचाल लेते हैं और कभी खेती-किसानी की बात करते हैं। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने आज लोकवाणी में राजीव गांधी किसान न्याय योजना के तहत किए गए वादों और इस वर्ष योजना में हुए बदलाव पर चर्चा की।

एक बार दाऊ संबोधन प्रचलित करने की भी कोशिश हुई है

मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के लिए एक बार दाऊ संबोधन प्रचालित करने की भी कोशिश हो चुकी है। लोकसभा चुनाव का प्रचार अभियान शुरू होने के साथ यह कोशिश शुरू हुई थी। 31 मार्च 2019 को बस्तर के बागमोहलाई गांव में हुई चुनावी सभा में मुख्यमंत्री के सलाहकार राजेश तिवारी ने यह संबोधन प्रस्तावित किया था। उनका कहना था, दाऊ बड़े भाई को कहते हैं। मुख्यमंत्री पूरे प्रदेश के लिए बड़े भाई जैसे ही हैं। ऐसे में हमे दाऊ कहना चाहिए।

चाउर वाले बाबा कहलाते थे रमन सिंह

मुख्यमंत्री रहते हुए डॉ. रमन सिंह चाउर वाले बाबा कहे जाते थे। जन सभाओं में भाजपा नेता अक्सर इस संबोधन का इस्तेमाल करते थे। बाद में विपक्ष के लिए यह संबोधन ही हथियार बन गया। नान घोटालों के जिक्र के साथ चाउर वाले बाबा की छवि पर भी हमले हुए।

लोकवाणी में आज किसान न्याय योजना की चुनौतियां गिनाई

मुख्यमंत्री ने कहा, हमने 21 मई 2020 को राजीव गांधी किसान न्याय योजना की शुरूआत की थी। साल भर के भीतर चार किस्तों में पूरी राशि 5 हजार 628 करोड़ रुपयों का भुगतान कर दिया। कोरोना संकट आया तो जो लोग पहले चार किश्तों में राशि देने को लेकर आपत्ति कर रहे थे, वे कहने लगे कि अब किसानों को इसका फायदा नहीं मिलेगा। मैंने स्पष्ट कहा कि इसका नुकसान किसानों को नहीं होने देंगे। हमने बजट में 5 हजार 703 करोड़ का प्रावधान किया। पिछले वर्ष की तरह ही 21 मई अर्थात राजीव जी के शहादत दिवस पर1500 करोड़ रुपए का भुगतान किसानों के खाते में कर दिया। इसमें 20 लाख 53 हजार 482 किसानों ने धान बेचा है तथा शेष लगभग डेढ़ लाख किसानों ने मक्का व गन्ना बेचा है।

किसान न्याय की नई योजना का खूबियों पर भी बात की

मुख्यमंत्री ने कहा कि ‘राजीव गांधी किसान न्याय योजना’ में नए प्रावधान किए गए हैं। पहला प्रावधान यह है कि पिछले साल की तरह धान के साथ खरीफ की प्रमुख फसल मक्का, कोदो, कुटकी, सोयाबीन, अरहर, गन्ना फसल लेने वाले किसानों को 9 हजार रुपए प्रति एकड़ आदान सहायता राशि हर साल दी जाएगी। दूसरा प्रावधान उन किसानों के लिए जो धान के बदले अन्य निर्धारित फसलें लेना चाहते हैं। उन्हें 10 हजार रूपए प्रति एकड़ की दर से अनुदान सहायता राशि दी जाएगी। तीसरा प्रावधान उन किसानों के लिए जो धान के बदले वृक्षारोपण करेंगे तो उन्हें भी 10 हजार रूपए प्रति एकड़ की सहायता राशि दी जाएगी, यह तीन वर्ष के लिए होगी।

5,50,000 किसान बढ़ने का दावा भी किया

मुख्यमंत्री ने कहा, हमारी सरकार के कृषक हितैषी निर्णय के फलस्वरूप प्रदेश में लोगों ने खेती में निवेश भी बढ़ाया है। यहां विगत दो वर्षों में किसानों की संख्या 5 लाख 50 हजार बढ़ी है। कई प्रदेशों में लोग जब खेती को छोड़कर अन्य काम-धंधा अपना रहे है, तब हमारे यहां किसानों की संख्या बढ़ना एक अच्छा संकेत है। इसका अर्थ है कि हमारे प्रयास किसानों के घर तक पहुंच रहे है। प्रदेश में वर्ष 2017-18 की तुलना में वर्ष 2020-21 में पंजीकृत किसानों की संख्या 15 लाख से बढ़कर 21 लाख 52 हजार, समर्थन मूल्य पर धान बेचने वाले किसानों का प्रतिशत 76.47 से बढ़कर 95.38 प्रतिशत हो गई है। यहां किसानों की रूचि और उत्साह के कारण ही सर्वाधिक कृषि ऋण वितरण का लक्ष्य भी हासिल किया गया है।

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