- उमरिया में रेत माफिया का कथित सिंडिकेट! कमीशन का खेल, नदी-नालों की लूट और प्रशासन की चुप्पी पर बड़े सवाल
- कलेक्टर से मंत्री तक कमीशन पहुंचाने का दावा—आखिर किसके दम पर चल रहा रेत का कारोबार? मुख्यमंत्री पोर्टल की शिकायतों के बाद भी कार्रवाई का हिसाब दे प्रशासन!
खबर 30 दिन | विशेष खोजी रिपोर्ट | उमरिया, मध्यप्रदेश
उमरिया। उमरिया जिले में रेत के अवैध उत्खनन, भंडारण और परिवहन को लेकर उठ रहे सवाल अब प्रशासनिक जवाबदेही की सीधी परीक्षा बन गए हैं। नदी-नालों से रेत निकाले जाने, बरसात के दौरान प्रतिबंधों की कथित अनदेखी और शिकायतों पर कार्रवाई को लेकर गंभीर प्रश्न खड़े हैं। सबसे गंभीर सवाल उस कथित कमीशन के दावे पर है, जिसमें रेत कारोबार से जुड़े लोगों द्वारा कलेक्टर से लेकर मंत्री तक कमीशन पहुंचाने की बात कहे जाने का दावा किया गया है।
यदि यह दावा सही है, तो मामला केवल अवैध रेत कारोबार का नहीं, बल्कि सरकारी व्यवस्था में कथित मिलीभगत की जांच का भी है। और यदि दावा गलत है, तो उसकी सच्चाई भी सामने आनी चाहिए। आखिर इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच से कौन पीछे हट रहा है?
कमीशन किसका, संरक्षण किसका और जवाबदेही किसकी?
रेत कारोबार में कमीशन पहुंचाने के कथित दावे ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या किसी कारोबारी ने वास्तव में अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों तक कमीशन पहुंचाने की बात कही? क्या इसके समर्थन में रिकॉर्डिंग, गवाह, संदेश या वित्तीय लेन-देन के प्रमाण उपलब्ध हैं? क्या किसी स्वतंत्र एजेंसी से इसकी जांच कराई जाएगी?
कमीशन का दावा छोटा मामला नहीं है। इसकी जांच होनी चाहिए और सच सामने आना चाहिए।
किसी अधिकारी या मंत्री को बिना प्रमाण दोषी घोषित करना उचित नहीं है। लेकिन गंभीर आरोप सामने आने के बाद उनका सत्यापन करना भी प्रशासन की जिम्मेदारी है। जांच में यदि किसी की संलिप्तता प्रमाणित होती है, तो कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए—चाहे संबंधित व्यक्ति कितना ही प्रभावशाली क्यों न हो।
मुख्यमंत्री पोर्टल पर शिकायत, फिर भी रेत कारोबार पर लगाम कहां?
शिकायतकर्ता के अनुसार, मुख्यमंत्री पोर्टल पर शिकायत करने के बावजूद कथित अवैध उत्खनन और कारोबार पर प्रभावी रोक नहीं लगी। अब जिला प्रशासन को बताना चाहिए कि शिकायत पर किस अधिकारी ने जांच की, कितने स्थलों का निरीक्षण हुआ, क्या अनियमितताएं मिलीं और कितने लोगों के विरुद्ध कार्रवाई की गई।
यदि कार्रवाई हुई है, तो उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए। यदि शिकायत गलत पाई गई, तो जांच के निष्कर्ष सामने रखे जाएं। लेकिन यदि शिकायत सही है, तो जिम्मेदार लोगों के विरुद्ध कार्रवाई क्यों नहीं हुई—इसका जवाब भी दिया जाना चाहिए।
शिकायत का जवाब केवल पोर्टल पर दर्ज निस्तारण से नहीं, जमीन पर हुई कार्रवाई से मिलना चाहिए।
बरसात में भी उत्खनन हुआ? नियमों की धज्जियां उड़ाने वालों पर कार्रवाई कब?
बरसात के दौरान लागू प्रतिबंधों और पर्यावरणीय शर्तों के उल्लंघन का मुद्दा भी गंभीर है। संबंधित अवधि में किन खदानों को अनुमति थी, कहां उत्खनन हुआ और किस आधार पर रेत का परिवहन किया गया—इन सभी बिंदुओं की दस्तावेजी जांच होनी चाहिए।
यदि प्रतिबंधित अवधि में अवैध उत्खनन हुआ, तो मशीनों के संचालन, वाहनों की आवाजाही, परिवहन पास, रॉयल्टी और संबंधित अधिकारियों की निगरानी का रिकॉर्ड जांचा जाना चाहिए।
नदी-नालों से रेत निकालने वालों की जिम्मेदारी तय होगी, तो निगरानी में चूक करने वालों की भूमिका भी जांच के दायरे में आनी चाहिए।
जिला खनिज अधिकारी से सवाल पूछने पर जवाबदेही का सवाल-अंट संट बकने वाले खनिज अधिकारी पर कब होगी कार्यवाही?
शिकायतकर्ता का कहना है कि जिला खनिज अधिकारी से फोन पर सवाल पूछने पर संतोषजनक जवाब नहीं मिला और कथित तौर पर अनुचित भाषा का इस्तेमाल किया गया? जिला खनिज अधिकारी को किसका संरक्षण प्राप्त है?
खनिज विभाग स्पष्ट करे कि जिले में कितनी वैध खदानें संचालित थीं, कितने निरीक्षण किए गए, कितने अवैध उत्खनन के प्रकरण दर्ज हुए, कितने वाहन जब्त किए गए और कितनी जुर्माना राशि वसूल की गई।
यदि विभाग का काम नियमों का पालन सुनिश्चित करना है, तो जनता और पत्रकारों के सवालों का तथ्यात्मक जवाब देना भी सार्वजनिक जवाबदेही का हिस्सा है।
प्रशासन से सीधे सात सवाल
1. उमरिया जिले में स्वीकृत रेत खदानों और संबंधित अवधि की उत्खनन अनुमतियों का पूरा विवरण सार्वजनिक क्यों न किया जाए?
2. मुख्यमंत्री पोर्टल पर दर्ज शिकायत की जांच रिपोर्ट और कार्रवाई का विवरण क्या है?
3. बरसात के दौरान लागू प्रतिबंधों के उल्लंघन की जांच किस अधिकारी ने की?
4. कथित कमीशनखोरी के दावे की जांच के लिए स्वतंत्र जांच एजेंसी को जिम्मेदारी सौंपी जाएगी या नहीं?
5. रेत भंडारण स्थलों, परिवहन पास, रॉयल्टी और जब्ती के रिकॉर्ड का वास्तविक स्थिति से मिलान कराया जाएगा या नहीं?
6. यदि अधिकारियों की लापरवाही या मिलीभगत प्रमाणित होती है, तो उनके विरुद्ध क्या कार्रवाई होगी?
7. क्या जिला प्रशासन संयुक्त निरीक्षण कराकर उसकी रिपोर्ट जनता के सामने रखेगा?
उमरिया की नदियां किसी की निजी जागीर नहीं!
नदी-नालों से रेत का अनियंत्रित उत्खनन पर्यावरण, भूजल, प्राकृतिक संरचना और सरकारी राजस्व को प्रभावित कर सकता है। इसलिए इस मामले को केवल कारोबारियों तक सीमित करके नहीं देखा जाना चाहिए। जहां भी नियमों का उल्लंघन प्रमाणित हो, वहां उत्खनन करने वालों के साथ-साथ संबंधित निगरानी व्यवस्था की भूमिका भी जांची जानी चाहिए।
‘खबर 30 दिन’ और बीबीसी लाईव की स्पष्ट मांग है कि कथित कमीशनखोरी, अवैध उत्खनन और शिकायतों पर कार्रवाई में हुई देरी की निष्पक्ष जांच कराई जाए। जांच के निष्कर्ष सार्वजनिक हों और दोष सिद्ध होने पर किसी भी व्यक्ति को कानून से ऊपर न रखा जाए।
उमरिया की जनता को यह जानने का अधिकार है कि रेत का कारोबार किन अनुमतियों के तहत चल रहा है, सरकारी राजस्व कितना प्राप्त हो रहा है और नियमों के उल्लंघन पर कार्रवाई कौन कर रहा है।
अब सवालों को टालने का नहीं, रिकॉर्ड सामने रखने का समय है। कमीशन का दावा जांचिए, रेत उत्खनन का हिसाब दीजिए और जिम्मेदारी तय कीजिए।
इसी कड़ी में अगला अपडेट जल्द….









