- विकास की कीमत कौन चुकाएगा? विस्थापन के विरोध में महिलाओं और ग्रामीणों का धरना, पुलिस कार्रवाई के भी लगाए आरोप
विशेष रिपोर्ट
केन–बेतवा लिंक परियोजना को लेकर आदिवासी और प्रभावित ग्रामीणों का विरोध लगातार तेज होता दिखाई दे रहा है। सामने आई तस्वीरों में बड़ी संख्या में ग्रामीण नदी क्षेत्र में धरना देते नजर आ रहे हैं। कई प्रदर्शनकारी चिता जैसी लकड़ियों पर लेटे हुए हैं और हाथों में “न्याय दो, मुआवजा दो”, “केन–बेतवा लिंक” तथा अन्य मांगों से संबंधित तख्तियां लिए हुए हैं।
प्रदर्शनकारियों का दावा है कि परियोजना के कारण उनके घर, जमीन और जीवन-यापन के साधनों पर संकट खड़ा हो रहा है। उनका कहना है कि उचित मुआवजा और पुनर्वास की व्यवस्था किए बिना विकास परियोजना के नाम पर उन्हें अपनी जमीन छोड़ने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए।
16 दिन से जारी है प्रदर्शन का दावा
प्रदर्शन से जुड़े लोगों के अनुसार, कई आदिवासी परिवार पिछले 16 दिनों से लगातार आंदोलन कर रहे हैं। आंदोलनकारियों ने चिता पर लेटकर सरकार और प्रशासन का ध्यान अपनी मांगों की ओर खींचने का प्रयास किया है।
प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि उनकी मांगों को गंभीरता से सुनने के बजाय प्रशासनिक कार्रवाई और पुलिस बल का इस्तेमाल किया जा रहा है। तस्वीरों में बड़ी संख्या में महिलाएं और पुरुष धरनास्थल पर मौजूद दिखाई दे रहे हैं।
“विकास जरूरी है, लेकिन विस्थापितों का न्याय भी जरूरी”
आंदोलनकारियों का कहना है कि विकास परियोजनाओं का विरोध विकास रोकने के लिए नहीं, बल्कि विस्थापन के बदले उचित अधिकार, मुआवजा, पुनर्वास और भविष्य की सुरक्षा सुनिश्चित कराने के लिए है।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिन परिवारों की जमीन और जीवन इस परियोजना से प्रभावित होने की बात कही जा रही है, उन्हें क्या वास्तव में उनकी मांग के मुताबिक न्याय और पुनर्वास मिलेगा?
पुलिस कार्रवाई पर भी सवाल
प्रदर्शनकारियों की ओर से पुलिस पर कथित रूप से बल प्रयोग करने के आरोप लगाए गए हैं। यदि ये आरोप सही हैं तो शांतिपूर्ण तरीके से अपनी मांग रखने वाले लोगों के साथ बल प्रयोग के बजाय प्रशासन को बातचीत के जरिए समाधान निकालना चाहिए।
हालांकि, पुलिस और प्रशासन का आधिकारिक पक्ष इस रिपोर्ट में उपलब्ध नहीं है। इसलिए प्रदर्शनकारियों द्वारा लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और संबंधित अधिकारियों का पक्ष लिया जाना आवश्यक है।
अब सवाल यह है—केन–बेतवा लिंक परियोजना से जुड़े विकास के बीच विस्थापित आदिवासी परिवारों की आवाज आखिर कब सुनी जाएगी? क्या मुआवजा, पुनर्वास और अधिकारों पर सरकार कोई ठोस निर्णय लेगी?









