July 8, 2026 11:31 pm

एक पेड़ माँ के नाम… पर जंगल अडानी-अंबानी के नाम?

  • छत्तीसगढ़ में फिर शुरू  महाअभियान, लेकिन जंगल बचेंगे या सिर्फ फोटो?

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रायपुर/मनेन्द्रगढ़। अब्दुल सलाम क़ादरी

छत्तीसगढ़ में एक बार फिर “एक पेड़ माँ के नाम” अभियान का शंखनाद हो चुका है। सरकार पर्यावरण संरक्षण और वृक्षारोपण का संदेश दे रही है। राज्य सरकार ने इस अभियान को हरियाली और जनभागीदारी से जोड़कर आगे बढ़ाने की बात कही है।

लेकिन दूसरी ओर सवाल पूछने वालों का कहना है कि यदि लाखों पौधे लगाए जा रहे हैं तो दूसरी तरफ बड़े पैमाने पर जंगलों की कटाई और खनन परियोजनाओं को मंजूरी क्यों मिल रही है? यही सवाल अब वन क्षेत्रों में भी गूंज रहा है।

“एक पेड़ माँ के नाम, लेकिन लाखो पेड़ उद्योगों के नाम?”

कई सामाजिक कार्यकर्ताओं का तर्क है कि यदि एक तरफ पौधारोपण के कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं और दूसरी तरफ बड़े वन क्षेत्रों को खनन एवं औद्योगिक परियोजनाओं के लिए साफ किया जा रहा है, तो पर्यावरण संरक्षण का वास्तविक उद्देश्य अधूरा रह जाता है। ऐसे मामलों में वन स्वीकृतियां और पर्यावरणीय मंजूरियां लंबे समय से सार्वजनिक बहस का विषय रही हैं।

पेड़ लगाओ… फोटो खिंचाओ… फिर भूल जाओ?

सरकारी कार्यक्रमों में मंत्री, अधिकारी और जनप्रतिनिधि पौधे लगाते हैं। कैमरे चमकते हैं। अखबारों में तस्वीरें छपती हैं। सोशल मीडिया पर पोस्ट वायरल होती हैं।

लेकिन जनता पूछ रही है—

  • पिछले वर्षों में लगाए गए पौधों में कितने आज जीवित हैं?
  • उनकी निगरानी किसने की?
  • कितने पौधे सिर्फ कागजों में उगे?
  • करोड़ों रुपये के खर्च का पूरा हिसाब सार्वजनिक क्यों नहीं?

यदि सब कुछ पारदर्शी है तो सूचना मांगने पर उसे देने में हिचकिचाहट क्यों?

हरियाली का उत्सव या सवालों का जंगल?

जुलाई को फिर “एक पेड़ माँ के नाम” का उत्सव शुरू  हो गया है भाषण हों रहे है पौधे बांटने के लिए atm लग रहे है फिर पौधे लगाए जाएंगे और पर्यावरण बचाने की शपथ भी दिलाई जाएगी।

लेकिन आम आदमी का सवाल अब भी वही है—

“क्या एक पौधा लगाकर लाखो पेड़ों की कटाई का हिसाब बराबर हो जाता है?”

पर्यावरण विशेषज्ञ भी लगातार इस बात पर जोर देते रहे हैं कि पौधारोपण और प्राकृतिक, परिपक्व जंगलों का संरक्षण एक-दूसरे का विकल्प नहीं हैं। पुराने जंगलों का पारिस्थितिक महत्व नए पौधों से अलग होता है।

अगर जंगल सचमुच बचाने हैं तो—

  • सिर्फ पौधारोपण नहीं,
  • जंगलों की रक्षा भी जरूरी है,
  • खर्च का सामाजिक ऑडिट भी जरूरी है,
  • और हर पौधे का सार्वजनिक रिकॉर्ड भी जरूरी है।

आम आदमी तो यही कहेगा—

“एक पेड़ माँ के नाम, जंगल उद्योगों के नाम, और योजनाओं की मलाई कुछ खास लोगों के नाम!”

यह सब दिखावा और सिर्फ ढिंढोरा और कुछ नही..?

Khabar 30 Din
Author: Khabar 30 Din

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