एक ज़माना था जब मिलावट करने वालों पर छापे पड़ते थे। आज वही मिलावट सरकारी लक्ष्य बन गई है। फर्क बस इतना है कि पहले दूध में पानी मिलता था, अब पेट्रोल में एथेनॉल मिल रहा है—और इसे विकास का नया अध्याय बताया जा रहा है।
जनता सोच रही है कि आखिर ऐसा कौन-सा चमत्कार है कि शुद्ध पेट्रोल अब पुरानी सोच हो गया और मिश्रित पेट्रोल आधुनिक भारत की पहचान बन गया?
नीति के सबसे बड़े प्रचारक केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी हैं क्योकि इनके बेटे ही एथेनॉल उत्पादक है। उनके अनुसार एथेनॉल किसानों की आय बढ़ाएगा, तेल आयात घटाएगा और देश को आत्मनिर्भर बनाएगा। लेकिन आम आदमी पूछ रहा है—अगर सब कुछ इतना शानदार है, तो फिर विकल्प क्यों नहीं? जो शुद्ध पेट्रोल चाहता है, उसे शुद्ध पेट्रोल क्यों नहीं मिलता?
व्यंग्य यह है कि देश में अब हर चीज़ का समाधान एक ही बताया जा रहा है—कुछ मिला दो। कभी टैक्स मिला दो, कभी सेस मिला दो, अब पेट्रोल में एथेनॉल मिला दो।
जनता का अगला डर यह है कि कहीं कल यह न कहा जाए—”इंजन बदलिए, क्योंकि नीति बदल चुकी है।”
सरकार कहती है कि यह पर्यावरण के लिए अच्छा है। आलोचक पूछते हैं कि एथेनॉल उत्पादन में पानी की खपत, कृषि भूमि का उपयोग और स्थानीय पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभावों का पूरा हिसाब कौन देगा? क्या इन सवालों पर उतनी ही गंभीर चर्चा हुई, जितना प्रचार हुआ?
अब हाल यह है कि सवाल पूछिए तो जवाब मिलता है—”देशहित में है।”
जनता कहती है—देशहित में है तो ठीक है, लेकिन देशहित का बिल हर बार जनता ही क्यों चुकाए?
“लगता है अब देश का नया नारा यही है—शुद्ध चीज़ों का ज़माना गया, मिलावट ही विकास का नया मॉडल है!”









