अब्दुल सलाम कादरी
नई दिल्ली। देश में पेट्रोल में एथेनॉल मिश्रण की नीति को बढ़ावा देने के बीच चीनी की कीमतों में अचानक आई तेजी ने उपभोक्ताओं की चिंता बढ़ा दी है। घरेलू बाजार में चीनी के दाम पिछले कुछ समय में तेजी से बढ़े हैं और त्योहारी सीजन से पहले महंगाई का असर और गहरा होने की आशंका जताई जा रही है। हालिया रिपोर्टों के अनुसार खुदरा चीनी का भाव करीब 52 रुपये से बढ़कर लगभग 62 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गया है।
गन्ने का रुख चीनी से एथेनॉल की ओर
भारत में पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने की नीति के तहत गन्ने के रस, चीनी सिरप और शीरे सहित विभिन्न स्रोतों से एथेनॉल उत्पादन को प्रोत्साहित किया गया है। सरकार का उद्देश्य पेट्रोलियम आयात पर निर्भरता कम करना और विदेशी मुद्रा की बचत करना है।
लेकिन अब सवाल यह उठ रहा है कि ईंधन की जरूरत पूरी करने की कोशिश कहीं खाद्य वस्तु की कीमत पर तो नहीं पड़ रही है? रिपोर्टों के मुताबिक मौजूदा सीजन में करीब 30 लाख टन चीनी के बराबर उत्पादन एथेनॉल की ओर डायवर्ट हुआ है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे घरेलू बाजार में उपलब्ध चीनी की मात्रा प्रभावित हुई है।
चीनी का स्टॉक घटा, कीमतों में तेज उछाल
कम उत्पादन, घटते स्टॉक और त्योहारी मांग ने चीनी बाजार पर दबाव बढ़ाया है। रिपोर्टों में बताया गया है कि पिछले दो महीनों में घरेलू चीनी कीमतों में करीब 40 प्रतिशत तक की तेजी आई है। स्थिति को देखते हुए केंद्र सरकार ने एक दशक के बाद पहली बार 10 लाख टन कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति देने का फैसला किया है, ताकि घरेलू आपूर्ति बढ़ाई जा सके और कीमतों पर नियंत्रण पाया जा सके।
सरकार ने थोक उपभोक्ताओं के लिए चीनी के स्टॉक पर भी सीमा लगाने जैसे कदम उठाए हैं। इसका उद्देश्य जमाखोरी और कृत्रिम कमी की आशंका को रोकना बताया जा रहा है।
सरकार एथेनॉल नीति में बदलाव पर कर रही विचार
चीनी की कीमतों में रिकॉर्ड तेजी के बाद सरकार अगले सीजन में गन्ने को एथेनॉल उत्पादन के लिए डायवर्ट करने की मात्रा सीमित करने पर विचार कर रही है। रिपोर्टों के मुताबिक इससे घरेलू बाजार में अतिरिक्त चीनी उपलब्ध हो सकती है। वहीं, एथेनॉल उत्पादन के लक्ष्य को बनाए रखने के लिए मक्का और चावल जैसे वैकल्पिक कच्चे माल के इस्तेमाल को बढ़ावा देने पर विचार किया जा सकता है।
किसानों और चीनी मिलों पर भी असर
चीनी और एथेनॉल के बीच संतुलन का सीधा संबंध गन्ना किसानों और चीनी मिलों की अर्थव्यवस्था से भी है। एथेनॉल से मिलों को अतिरिक्त आय और गन्ने के बेहतर उपयोग का अवसर मिलता है, जबकि चीनी उत्पादन बढ़ने से घरेलू बाजार में आपूर्ति मजबूत होती है। इसलिए सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती किसानों को उचित भुगतान, चीनी मिलों की आर्थिक व्यवहार्यता, सस्ती चीनी और एथेनॉल मिश्रण के लक्ष्य—इन सभी के बीच संतुलन बनाने की है।
विशेषज्ञों के अनुसार यदि चीनी की कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहती हैं तो मिलों के लिए चीनी बेचकर कमाई करना एथेनॉल उत्पादन की तुलना में अधिक आकर्षक हो सकता है।
सवाल यह है—ईंधन सस्ता या खाद्य वस्तु?
एथेनॉल मिश्रण से पेट्रोलियम आयात और विदेशी मुद्रा पर दबाव कम करने का फायदा निश्चित रूप से है, लेकिन मौजूदा परिस्थितियों ने “फूड बनाम फ्यूल” की बहस को फिर सामने ला दिया है। आने वाले त्योहारी मौसम में चीनी की मांग बढ़ने वाली है। ऐसे में सरकार के सामने चुनौती है कि एथेनॉल नीति को जारी रखते हुए घरेलू बाजार में चीनी की पर्याप्त उपलब्धता और आम उपभोक्ता के लिए उचित कीमत कैसे सुनिश्चित की जाए।
फिलहाल चीनी की बढ़ती कीमत ने यह सवाल जरूर खड़ा कर दिया है कि एथेनॉल की बढ़ती मांग का बोझ कहीं आम उपभोक्ता की रसोई पर तो नहीं पड़ रहा।
— अब्दुल सलाम कादरी









