March 19, 2026 4:30 pm

भारत और पाकिस्तान के बीच ‘ड्रोन रेस’, क्या हैं इस होड़ के ख़तरे और किसका पलड़ा है भारी

भारत और पाकिस्तान दोनों ही अपने शस्त्रागार में सैन्य ड्रोन का इज़ाफ़ा कर रहे हैं.

दोनों की ओर से न केवल कई विदेशी ड्रोन ख़रीदे गए हैं, बल्कि ख़ुद भी इस टेक्नोलॉजी को तैयार किया गया है जो बिना पायलट के दुश्मन पर निगरानी रखने, जासूसी करने या लक्ष्यों को निशाना बनाने की क्षमता रखती है.

एशिया की तीन पड़ोसी परमाणु शक्तियों भारत, पाकिस्तान और चीन की ओर से अपनी सैन्य क्षमता बढ़ाने के लिए बिना पायलट उड़ान भरने वाले ड्रोन के इस्तेमाल में तेज़ी देखी गई है.

विशेषज्ञों का मानना है कि सेना में व्यापक पैमाने पर ड्रोन के शामिल होने से युद्ध का तरीक़ा बदल गया है और किसी भी विवाद या झड़प की स्थिति में ड्रोन का इस्तेमाल बहुत अधिक होगा.

विशेषज्ञों के अनुसार इन तीनों देशों में बड़े पैमाने पर ड्रोन की मौजूदगी और एक दूसरे के ख़िलाफ़ जासूसी और निगरानी में उनका बढ़ता हुआ इस्तेमाल निकट भविष्य में टकराव और तनाव का कारण बन सकता है.

इस रिपोर्ट में हमने यह जानने की कोशिश की है कि परंपरागत प्रतिद्वंद्वी समझे जाने वाले पड़ोसी देश भारत और पाकिस्तान के पास ड्रोन क्षमता कैसी है और हाल के समय में दोनों ने किस तरह की अनमैन्ड एरियल व्हीकल्स (यूएवी) में इज़ाफ़ा किया है

भारत के पास पाकिस्तान से अधिक ड्रोन

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इमेज कैप्शन,रक्षा मामलों के विश्लेषक राहुल बेदी ने बीबीसी को बताया कि भारत और पाकिस्तान दोनों ही ड्रोन्स की संख्या बढ़ा रहे हैं

सैन्य उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल होने वाले ड्रोन्स काफ़ी ऊंचाई पर देर तक उड़ान भरने और रडार में आए बिना ज़मीन पर सेना की गतिविधियों, उनकी तैनातियों, महत्वपूर्ण संयंत्रों, नए निर्माण और सैनिक ठिकानों आदि की प्रभावी निगरानी और विशेष लक्ष्य को भेदने में ज़बर्दस्त महारत रखते हैं.

रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार एक सैन्य ड्रोन तीन बुनियादी काम कर सकता है:

  • निगरानी करना और प्रतिद्वंद्वी की गतिविधियों पर नज़र रखना
  • जासूसी करना यानी यह देखना कि दूसरी तरफ़ हथियार या सेना कहां तैनात हैं
  • लक्ष्य को निशाना बनाना और उसे तबाह करना

कई ड्रोन्स यह तीनों काम करते हैं लेकिन कुछ की क्षमता सीमित होती है.

अगर हम ड्रोन्स के लिहाज़ से भारत और पाकिस्तान की सैन्य क्षमता की तुलना करें तो यह पता चलता है कि दोनों प्रतिद्वंद्वी देशों ने हाल के दौरान इसमें वृद्धि की है.

रक्षा मामलों के विश्लेषक राहुल बेदी ने बीबीसी को बताया कि भारत और पाकिस्तान दोनों ही ड्रोन्स की संख्या बढ़ा रहे हैं.

उनका अंदाज़ा है कि भारत के पास अगले दो-चार सालों में लगभग पांच हज़ार ड्रोन्स होंगे.

उनके अनुसार वैसे तो पाकिस्तान के पास ‘भारत से कम ड्रोन्स’ हैं लेकिन इसके बावजूद पाकिस्तान के पास मौजूद ड्रोन्स में विभिन्न क्षमताएं हैं और यह 10 से 11 अलग-अलग बनावट के हैं.

भारत के ड्रोन्स

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इमेज कैप्शन,मई 2020 में लद्दाख क्षेत्र में चीन के साथ सीमा पर तनाव के बाद ड्रोन और ‘यूएवी’ का महत्व भारत में बहुत बढ़ गया है

अगर हम भारत की मिसाल लें तो उसने इस साल अक्टूबर के दौरान अमेरिका से साढ़े तीन अरब डॉलर मूल्य के 31 प्रीडेटर ड्रोन्स ख़रीदने का समझौता किया है.

उनके साथ 50 करोड़ डॉलर के उन ड्रोन्स के ज़रिए लक्ष्य को तबाह करने में इस्तेमाल होने वाले बम और लेज़र गाइडेड मिसाइलें भी ख़रीदी जाएंगी.

अमेरिका के प्रीडेटर ड्रोन्स बहुत महंगे हैं. भारतीय मुद्रा में एक ड्रोन की क़ीमत लगभग 950 करोड़ रुपए है.

इन 31 में से 15 ड्रोन्स भारतीय नौसेना में शामिल किए जाएंगे और बाक़ी 16 थल सेना और वायुसेना में बराबर बराबर दिए जाएंगे.

प्रीडेटर ड्रोन्स दुनिया के सबसे कामयाब और ख़तरनाक ड्रोन माने जाते हैं. इनका इस्तेमाल अफ़ग़ानिस्तान, इराक, सीरिया, सोमालिया और कई दूसरे देशों के ठिकानों और लक्ष्यों को तबाह करने में किया गया था.

भारत इससे पहले इसराइल के ‘हीरोन’ ख़रीद चुका है और इसराइल एयरोस्पेस एजेंसी से लाइसेंस के तहत वह अब यह ड्रोन ख़ुद भारत ने बना रहा है.

मई 2020 में लद्दाख क्षेत्र में चीन के साथ सीमा पर तनाव के बाद ड्रोन और ‘यूएवी’ का महत्व भारत में बहुत बढ़ गया है.

भारत के पास इसराइली में बने हेरोन ड्रोन भी हैं.

यूक्रेन और ग़ज़ा की जंगों में ड्रोन्स का बहुत इस्तेमाल हुआ है. विश्लेषक अजय शुक्ला ने बीबीसी से बात करते हुए कहा, “ड्रोन्स उन जगहों पर अधिक कारगर साबित होते हैं जहां जिस पक्ष पर हमला हो रहा है उसके पास वायु रक्षा प्रणाली बहुत कमज़ोर हो.”

“ड्रोन्स का जो इस्तेमाल आप ग़ज़ा और कई दूसरी जगहों पर देख रहे हैं. वहां जिन पर हमला हो रहा है उनके पास एयर डिफ़ेंस सिस्टम या आर्म्ड एयर फ़ोर्स जोकि ड्रोन से अधिक क्षमतावान हो, मौजूद नहीं.”

“लेकिन अगर आप भारत और चीन का उदाहरण लें, तो चीन के शस्त्रागार में मौजूद आधुनिक ड्रोन्स भारत के उन्हीं इलाक़ों में कारगर साबित होंगे जहां कोई एयर फ़ोर्स या लड़ाकू विमान न हों. बाक़ी जगहों पर वह कामयाब नहीं होंगे.”

उनका कहना है, “पाकिस्तान, चीन या भारत में वायु रक्षा प्रणाली जैसे रडार, कंट्रोल ऐंड कमांड सिस्टम (जो कि एयर स्पेस को कंट्रोल करते हैं) और वायुसेना बहुत मज़बूत हैं. यहां तक कि ड्रोन्स भी दुश्मन के ड्रोन को रोक सकते हैं.”

“यहां उनका रोल मूल रूप से हवा में बहुत ऊंचाई पर उड़ान भर कर दुश्मन के विशेष क्षेत्रों पर नज़र रखने और विशेष लक्ष्यों की जासूसी करने और अहम तस्वीरें लेने तक सीमित रहेगा.”

पिछले 8-10 वर्षों में युद्ध की प्रकृति बदल गई है और ड्रोन अब उनका एक अहम हिस्सा है. ड्रोन अब पारंपरिक युद्ध के बड़े प्लेटफ़ॉर्मों जैसे टैंक व आर्टिलरी आदि को बहुत हद तक नुक़सान पहुंचा सकता है. इस पर दोनों देश काफ़ी ध्यान दे रहे हैं.

लेकिन राहुल बेदी मानते है कि भारत और पाकिस्तान के बीच ड्रोन्स को लेकर रेस चल रही है.

उनके मुताबिक भविष्य में ‘रिमोट कंट्रोल वाॅरफ़ेयर बढ़ेगा क्योंकि आने वाले दिनों में टेक्नोलॉजी के साथ मशीन इंसान की जगह ले लेगी.’

वह कहते हैं कि दोनों परमाणु हथियार संपन्न देश हैं और अगर ग़लती से भी कोई ड्रोन किसी परमाणु संयंत्र के ऊपर आ गया तो गंभीर समस्या पैदा करेगा और इससे तनाव बढ़ जाएगा.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित

Khabar 30 Din
Author: Khabar 30 Din

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