March 30, 2026 4:20 pm

झीरम घाटी हमला: 13 साल बाद भी जांच अधूरी, नक्सलियों की हिंसा के सबूत आज भी मौजूद

31 मार्च को देश से नक्सलवाद के खात्मे की समयसीमा तय की गई है. लेकिन जैसे-जैसे यह तारीख करीब आ रही है, छत्तीसगढ़ के बस्तर की झीरम घाटी का नाम आज भी एक खामोश सिहरन पैदा कर देता है.

13 साल बाद भी, यह अतीत दबने को तैयार नहीं है. 25 मई 2013 को झीरम घाटी का इलाका एक कत्लेआम का मैदान बन गया था. नक्सलियों ने कांग्रेस की ‘परिवर्तन यात्रा’ से लौट रहे नेताओं के काफिले पर घात लगाकर हमला किया था और अंधाधुंध फायरिंग में 32 लोगों की जान चली गई थी. इनमें महेंद्र कर्मा, नंद कुमार पटेल और विद्याचरण शुक्ल जैसे बड़े नेता शामिल थे. यह हमला सिर्फ एक नरसंहार नहीं था, बल्कि उस दौर में बस्तर पर नक्सलियों की पकड़ और ताकत का खुला प्रदर्शन भी था.

झीरम हमला एक टर्निंग पॉइंट

2013 में बस्तर को देश के ‘रेड कॉरिडोर’ का केंद्र माना जाता था. घने जंगल, कमजोर सड़क नेटवर्क और प्रशासन की सीमित मौजूदगी ने नक्सलियों को यहां लगभग पूरी तरह से खुला मैदान दे रखा था. झीरम हमला एक टर्निंग पॉइंट साबित हुआ. इसके बाद राज्य ने अपनी रणनीति बदली अंदरूनी इलाकों में सुरक्षा कैंप स्थापित किए गए, सड़क नेटवर्क का विस्तार हुआ और लगातार ऑपरेशनों के जरिए नक्सलियों की पकड़ को धीरे-धीरे कमजोर किया गया.

2026 तक तस्वीर कुछ बदली

2026 तक तस्वीर कुछ बदली हुई नजर आती है. बस्तर के बड़े हिस्सों में अब सुरक्षा बलों की मजबूत मौजूदगी है. बड़े हमलों की संख्या कम हुई है. कई शीर्ष नक्सली नेता मारे गए हैं, गिरफ्तार हुए हैं या सरेंडर कर चुके हैं. लेकिन सतह के नीचे एक जटिल हकीकत अब भी मौजूद है. झीरम और उसके आसपास के गांवों में आज भी बुनियादी सुविधाओं की कमी साफ दिखती है. सड़कें अधूरी हैं या टूटी फूटी हैं, स्वास्थ्य सेवाएं सीमित हैं और पानी-बिजली तक पहुंच असमान है. ग्रामीण मानते हैं कि पहले जैसा भय अब कम हुआ है, लेकिन बुनियादी सुविधाओं की उन्हें दरकार है.

हिंसा का सबसे सजीव सबूत

झीरम घाटी खुद एक ऐसी कहानी कहती है, जिसे कोई सरकारी दावा मिटा नहीं सकता. सड़क के एक ओर शहीद स्मारक खड़ा है, जहां उन लोगों को श्रद्धांजलि दी जाती है, जिन्होंने अपनी जान गंवाई. लेकिन उससे कुछ ही दूरी पर, जंगल के भीतर, एक और सच्चाई मौजूद है उस दिन की एक लाल बोलेरो का जंग खाया दरवाजा आज भी वहीं पड़ा है. यह किसी स्मारक का हिस्सा नहीं है, लेकिन यह उस दिन की हिंसा का सबसे सजीव सबूत है.

13 साल बाद भी जांच पूरी नहीं हो सकी

एनडीटीवी से बातचीत में बस्तर के आईजी सुंदरराज पी ने इस हमले को ‘बेहद दुखद और दुर्भाग्यपूर्ण’ बताया. उन्होंने कहा कि इसके बाद सुरक्षा बलों ने लगातार प्रयास कर क्षेत्र में सुरक्षा का माहौल बनाने की दिशा में काम किया. उनके मुताबिक, झीरम हमले के लिए जिम्मेदार दरभा डिवीजन कमेटी को पूरी तरह खत्म कर दिया गया है इसके कई सदस्य मारे गए, कई गिरफ्तार हुए और कई ने आत्मसमर्पण कर दिया. लेकिन इन सबके बावजूद कई सवालों के जवाब अब भी नहीं मिले हैं. तेरह साल बाद भी इस हमले की जांच पूरी नहीं हो सकी है. एनआईए, सीबीआई, एसआईटी और न्यायिक आयोग कई एजेंसियों ने जांच की, लेकिन साजिश की पूरी तस्वीर अब तक सामने नहीं आ पाई है. हिड़मा, देवा और बसवराजू जैसे नाम बार-बार सामने आते रहे, लेकिन जवाबदेही की पूरी श्रृंखला अब भी स्पष्ट नहीं है.

पीड़ित परिवारों को अब भी इंतजार

पीड़ित परिवारों के लिए समय बीत जाने के बावजूद इंतजार खत्म नहीं हुआ है. उनके लिए न्याय आंकड़ों या ऑपरेशनों से नहीं, बल्कि इस हमले के पीछे की पूरी सच्चाई सामने आने से मिलेगा. 31 मार्च की समयसीमा के करीब पहुंचते-पहुंचते बस्तर एक चौराहे पर खड़ा है. एक ओर बदलाव दिखता है सरकार की बढ़ती मौजूदगी, कम होती हिंसा और आगे बढ़ने की कोशिश. लेकिन दूसरी ओर अधूरी कहानी भी है विकास की कमी, भय के बचे हुए निशान और एक ऐसा नरसंहार, जिसकी पूरी सच्चाई अब भी सामने आनी बाकी है. आज झीरम सिर्फ एक घटना नहीं है. यह एक कसौटी है, यह बताने की कि बस्तर कितना आगे बढ़ा है और अभी कितना सफर बाकी है.

Khabar 30 Din
Author: Khabar 30 Din

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