अब्दुल सलाम क़ादरी
- कैम्पा मद के भुगतान के वाउचर और कोषांक की जानकारी मांगने पर सूचना देने से इनकार, आदेश में RTI एक्ट के साथ डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) एक्ट का भी हवाला।
मनेन्द्रगढ़/कटघोरा। सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 का उद्देश्य सरकारी कामकाज में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना है। लेकिन कटघोरा वनमंडल से जारी प्रथम अपील प्रकरण क्रमांक 118/2026 के आदेश ने RTI कानून के इस्तेमाल को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

अपीलकर्ता अब्दुल सलाम कादरी ने वित्तीय वर्ष 01 जनवरी 2025 से मार्च 2026 तक कैम्पा मद से किए गए देयक भुगतान के वाउचर एवं उनके कोषांक की सत्यापित प्रतियां मांगी थीं। लेकिन जनसूचना अधिकारी द्वारा सूचना देने से इनकार कर दिया गया, जिसके बाद प्रथम अपील दायर की गई।
प्रथम अपीलीय अधिकारी एवं वनमंडलाधिकारी कटघोरा द्वारा पारित आदेश में कहा गया कि मांगी गई जानकारी तृतीय पक्ष से संबंधित है तथा इसमें व्यक्तिगत जानकारी शामिल होने के कारण सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 8(1)(d), 8(1)(e) और 8(1)(j) के तहत जानकारी उपलब्ध नहीं कराई जा सकती।
आदेश में DPDP एक्ट का भी हवाला
आदेश के ‘निष्कर्ष’ भाग में केवल RTI अधिनियम का ही नहीं, बल्कि डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) अधिनियम का भी उल्लेख किया गया है। आदेश में लिखा गया है कि “Personal Data” में नाम, आधार नंबर, ई-मेल, मोबाइल नंबर, फोटो आदि पहचान बताने वाली जानकारियां शामिल हैं। इसी आधार पर यह तर्क दिया गया कि मांगी गई सूचना व्यक्तिगत डेटा से जुड़ी होने के कारण उपलब्ध नहीं कराई जा सकती।
यहीं से उठते हैं सबसे बड़े सवाल
कानूनी जानकारों का कहना है कि सरकारी धन से किए गए भुगतान, वाउचर और सार्वजनिक धन के उपयोग से जुड़ी जानकारी पर पारदर्शिता का सिद्धांत लागू होता है। यदि किसी दस्तावेज़ में व्यक्तिगत जानकारी दर्ज है, तो उस हिस्से को छिपाकर (Redact/Mask) शेष सूचना उपलब्ध कराने की संभावना पर विचार किया जा सकता है।
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या पूरे दस्तावेज़ को ही रोक देना उचित था, या केवल व्यक्तिगत जानकारी हटाकर शेष रिकॉर्ड उपलब्ध कराया जा सकता था?
RTI पर नई ‘ढाल’ बनता जा रहा है DPDP?
इस आदेश ने एक नई बहस भी छेड़ दी है। अब तक अधिकांश विभाग सूचना रोकने के लिए RTI अधिनियम की धारा 8 का हवाला देते थे, लेकिन इस आदेश में DPDP एक्ट का भी सहारा लिया गया है। इससे आशंका जताई जा रही है कि भविष्य में कहीं पारदर्शिता से जुड़े मामलों में भी DPDP कानून का उपयोग कर सूचनाएं रोकी न जाने लगें।
अब राज्य सूचना आयोग की निगाहें
आदेश में स्पष्ट उल्लेख है कि यदि अपीलकर्ता संतुष्ट नहीं हैं तो वे छत्तीसगढ़ राज्य सूचना आयोग में द्वितीय अपील प्रस्तुत कर सकते हैं। अब सबकी निगाहें इस बात पर हैं कि आयोग इस आदेश को बरकरार रखता है या पारदर्शिता के हित में सूचना उपलब्ध कराने का निर्देश देता है।
DFO का पक्ष भी आया सामने
जब इस संबंध में कटघोरा वनमंडलाधिकारी (DFO) श्री कुमार निशांत से बातचीत की गई, तो उन्होंने बताया कि:
“इस प्रकार के एक-दो आदेश मुख्य वन संरक्षक (CCF) कार्यालय से पहले ही जारी किए जा चुके हैं। हमने भी उसी आधार और दिशा-निर्देशों का पालन करते हुए यह आदेश पारित किया है।”
हालांकि DFO के इस जवाब के बाद अब कई नए सवाल खड़े हो रहे हैं। यदि वास्तव में ऐसे आदेश मुख्य वन संरक्षक कार्यालय से जारी हुए हैं, तो क्या अब RTI अधिनियम के साथ DPDP एक्ट का हवाला देकर सरकारी खर्चों से जुड़ी जानकारियां रोके जाने की नई प्रशासनिक व्यवस्था लागू की जा रही है?
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसी दस्तावेज़ में व्यक्तिगत जानकारी हो, तो उसे ब्लैकआउट (Redaction) कर शेष जानकारी उपलब्ध कराने का विकल्प भी कानून में मौजूद है। ऐसे में पूरे दस्तावेज़ को रोकने के निर्णय की वैधानिकता पर अंतिम फैसला राज्य सूचना आयोग या सक्षम न्यायिक मंच ही करेगा।
अब यह मामला केवल कटघोरा वनमंडल तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या मुख्य वन संरक्षक कार्यालय द्वारा जारी कथित आदेश RTI कानून की भावना के अनुरूप हैं या नहीं?? छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के माननीय चीफ जस्टिस महोदय को पत्र लिखकर इस मामले में हस्तक्षेप करने की बात भी सामने आ रही है।









