अब्दुल सलाम क़ादरी। लखनऊ। उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार के कार्यकाल में कानून-व्यवस्था और अतिक्रमण के खिलाफ कार्रवाई के नाम पर उठाए गए कदमों को लेकर लगातार राजनीतिक और सामाजिक बहस होती रही है। आलोचकों का आरोप है कि इन कार्रवाइयों का असर मुस्लिम समुदाय पर disproportionately पड़ा है और धार्मिक स्वतंत्रता तथा कानून के समान अनुप्रयोग को लेकर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं। हालांकि, राज्य सरकार का तर्क रहा है कि कार्रवाई धर्म के आधार पर नहीं, बल्कि कानून और प्रशासनिक नियमों के उल्लंघन पर की जाती है।
नमाज पर रोक या सार्वजनिक जगहों पर प्रतिबंध?
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सार्वजनिक सड़कों और अन्य सार्वजनिक स्थानों पर नमाज को लेकर सख्त रुख अपनाया है। सरकार का तर्क है कि सड़कें आवागमन के लिए हैं और किसी भी धार्मिक गतिविधि के कारण यातायात बाधित नहीं होना चाहिए। यह नियम केवल मुस्लिम समुदाय के लिए नहीं बल्कि सार्वजनिक स्थानों पर किसी भी धार्मिक आयोजन के संबंध में प्रशासनिक नियंत्रण के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
लेकिन मुस्लिम संगठनों और सरकार के आलोचकों का सवाल है कि क्या धार्मिक गतिविधियों के नियमन को लागू करते समय प्रशासन सभी समुदायों के साथ समान व्यवहार कर रहा है?
यहीं से उत्तर प्रदेश की धार्मिक स्वतंत्रता को लेकर विवाद गहरा जाता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 25 सभी व्यक्तियों को धर्म को मानने, आचरण करने और प्रचार करने की स्वतंत्रता देता है, हालांकि यह अधिकार सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के अधीन है।
अजान पर विवाद—क्या लाउडस्पीकर धार्मिक अधिकार है?
अजान को लेकर भी उत्तर प्रदेश में लंबे समय से विवाद चला आ रहा है। यहां एक महत्वपूर्ण कानूनी तथ्य सामने रखना जरूरी है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 15 मई 2020 के फैसले में कहा था कि अजान इस्लाम का अभिन्न हिस्सा हो सकती है, लेकिन लाउडस्पीकर या अन्य ध्वनि-वर्धक उपकरण के माध्यम से अजान देना धार्मिक स्वतंत्रता का अनिवार्य हिस्सा नहीं है। अदालत ने साथ ही कहा कि बिना अनुमति लाउडस्पीकर का इस्तेमाल Noise Pollution Rules के अधीन होगा।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया था कि बिना लाउडस्पीकर के मानवीय आवाज में अजान देने पर प्रशासन को केवल कोविड गाइडलाइन का हवाला देकर बाधा नहीं डालनी चाहिए, जब तक अन्य वैधानिक नियमों का उल्लंघन न हो।
यानी अजान पर पूर्ण प्रतिबंध और लाउडस्पीकर के नियमन को एक ही चीज मानना कानूनी रूप से सही नहीं होगा।
2026 में फिर उठा लाउडस्पीकर का मुद्दा
फरवरी 2026 में रमजान के दौरान उत्तर प्रदेश सरकार ने विधानसभा में लाउडस्पीकर को लेकर अपना रुख स्पष्ट करते हुए कहा कि ध्वनि प्रदूषण संबंधी सुप्रीम कोर्ट के निर्देश लागू हैं। सरकार ने रात के समय लाउडस्पीकर के इस्तेमाल को लेकर नियमों का हवाला दिया।
सरकार का कहना है कि धार्मिक स्वतंत्रता के साथ-साथ दूसरे नागरिकों के शांति, नींद और स्वास्थ्य के अधिकार की भी रक्षा करना प्रशासन की जिम्मेदारी है।
‘बुलडोजर न्याय’ पर सुप्रीम कोर्ट की सख्ती
उत्तर प्रदेश की सबसे बड़ी विवादित नीतियों में से एक रही है—आरोपियों या अपराध के आरोप झेल रहे लोगों के मकानों पर बुलडोजर कार्रवाई।
इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर 2024 में महत्वपूर्ण फैसला दिया। अदालत ने कहा कि केवल किसी व्यक्ति के आरोपी या दोषी होने के आधार पर उसकी संपत्ति को मनमाने तरीके से नहीं गिराया जा सकता। अदालत ने अधिकारियों के लिए नोटिस और उचित प्रक्रिया सहित विस्तृत दिशानिर्देश जारी किए।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि किसी व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई का असर उसके परिवार के उन सदस्यों पर नहीं पड़ना चाहिए जिनका कथित अपराध से कोई संबंध नहीं है।
यही वह बिंदु है जहां ‘बुलडोजर न्याय’ बनाम ‘कानूनी अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई’ की बहस सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है।
सरकार और प्रशासन आम तौर पर ऐसी कार्रवाइयों को अवैध निर्माण या अतिक्रमण के खिलाफ कार्रवाई बताते हैं, जबकि विपक्ष और अधिकार संगठनों का आरोप रहा है कि कई मामलों में कार्रवाई आरोपी के खिलाफ दंडात्मक कदम जैसी दिखाई देती है।
क्या मुसलमानों को फर्जी मुकदमों में फंसाया जाता है?
यह आरोप बेहद गंभीर है और इसे पूरे समुदाय पर लागू सामान्य तथ्य के रूप में पेश करने के लिए ठोस आधिकारिक आंकड़ों की जरूरत होगी।
हालांकि, उत्तर प्रदेश में पुलिस कार्रवाई और कथित फर्जी मुकदमों को लेकर मानवाधिकार आयोग तथा अदालतों के हस्तक्षेप के मामले सामने आए हैं।
मसलन, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने 2021 में एटा जिले के एक मामले में मीडिया रिपोर्ट का स्वतः संज्ञान लेते हुए पुलिसकर्मियों द्वारा 10 लोगों को कथित रूप से झूठे मामले में फंसाकर गिरफ्तार करने के आरोप पर उत्तर प्रदेश के DGP से रिपोर्ट मांगी थी।
हाल ही में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मुजफ्फरनगर के एक व्यक्ति के लापता होने के मामले में CBI जांच का आदेश भी दिया है। अदालत ने पुलिस की जांच पर गंभीर सवाल उठाते हुए व्यक्ति के जीवित या मृत होने की स्थिति स्पष्ट करने को कहा।
हालांकि इन मामलों को मुसलमानों के खिलाफ व्यापक सरकारी नीति का प्रमाण कहना भी बिना अतिरिक्त आंकड़ों के उचित नहीं होगा।
असल सवाल: कानून सबके लिए एक जैसा है या नहीं?
उत्तर प्रदेश की मौजूदा राजनीति में असली बहस यही है।
अगर सड़क पर नमाज से यातायात प्रभावित होता है तो प्रशासन को उसे रोकने का अधिकार है। अगर मस्जिद या मंदिर का लाउडस्पीकर निर्धारित ध्वनि सीमा का उल्लंघन करता है तो उस पर कार्रवाई होनी चाहिए।
लेकिन सवाल तब पैदा होता है जब कानून का इस्तेमाल चयनात्मक दिखाई दे।
एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी व्यक्ति का धर्म, राजनीतिक विचार या समुदाय उसकी कानूनी सुरक्षा को कम नहीं कर सकता। संविधान का अनुच्छेद 25 धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देता है, जबकि सार्वजनिक व्यवस्था और अन्य नागरिकों के अधिकारों की रक्षा भी उतनी ही जरूरी है।
इसलिए उत्तर प्रदेश की तस्वीर को केवल ‘मुसलमानों पर अत्याचार’ या केवल ‘कानून-व्यवस्था की कार्रवाई’ कहकर खत्म करना वास्तविक स्थिति को सरल बना देना होगा।

कांवड़ यात्रा में सड़कें बंद, तो नमाज के 5 मिनट पर इतना विवाद क्यों?
सवाल सिर्फ नमाज का नहीं, समानता के पैमाने का है
उत्तर प्रदेश में धार्मिक आयोजनों और सार्वजनिक व्यवस्था को लेकर एक सवाल बार-बार सामने आता है—अगर धार्मिक आस्था के बड़े आयोजनों के लिए घंटों या कई दिनों तक ट्रैफिक डायवर्ट किया जा सकता है, सड़कें बंद की जा सकती हैं, तो कुछ मिनट की नमाज के लिए प्रशासनिक संवेदनशीलता का पैमाना अलग क्यों दिखाई देता है?
सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या हर कार्रवाई में उचित प्रक्रिया, समानता और संवैधानिक अधिकारों का पालन हो रहा है?
और यदि किसी निर्दोष नागरिक पर झूठा मुकदमा दर्ज होता है या बिना उचित कानूनी प्रक्रिया के उसका घर गिराया जाता है, तो मामला केवल किसी एक समुदाय का नहीं रहता—वह संविधान और कानून के शासन का सवाल बन जाता है।









