March 1, 2026 3:23 am

रेफर की औपचारिकता पूरी, रास्ते में बुझ गई जिंदगी

आधी रात रेलवे फाटक के पास हुई मौत, सुबह समाजसेवियों ने शव और परिजनों को पहुंचाया गांव

शहडोल। जिले की स्वास्थ्य व्यवस्था की संवेदनशीलता पर एक बार फिर बड़ा प्रश्नचिह्न लग गया है। ग्राम खोल्हाड निवासी बिन्नू बैगा की सोमवार देर रात सड़क पर हुई मौत ने सरकारी व्यवस्थाओं की हकीकत उजागर कर दी। इस दर्दनाक घटना ने स्वास्थ्य व्यवस्था के दावों और जमीनी हकीकत के बीच की दूरी को उजागर कर दिया है। स्थानीय लोगों ने मामले की जांच और जिम्मेदारों पर कार्रवाई की मांग की है।

अस्पताल से मेडिकल कॉलेज का सफर बना जानलेवा

प्राप्त जानकारी के मुताबिक दो दिन पूर्व अस्वस्थ होने पर बिन्नू बैगा को जिला अस्पताल शहडोल में भर्ती कराया गया था। इलाज के दौरान हालत बिगड़ने पर सोमवार देर रात करीब 3 बजे चिकित्सकों ने उन्हें मेडिकल कॉलेज के लिए रेफर कर दिया।

रेफर किया, पर एंबुलेंस नहीं दी

परिजनों का आरोप है कि मरीज को रेफर तो कर दिया गया लेकिन अस्पताल प्रबंधन की ओर से मेडिकल कॉलेज तक ले जाने के लिए एंबुलेंस की कोई व्यवस्था नहीं की गई। आर्थिक रूप से कमजोर परिवार निजी वाहन की व्यवस्था भी नहीं कर सका।

मजबूरी में पैदल निकले, रास्ते में मौत

मजबूरन परिजन बीमार बिन्नू बैगा को सहारा देकर पैदल ही गांव खोल्हाड की ओर ले जाने लगे। रेलवे फाटक के समीप मरीज थककर बैठ गया। हालत और बिगड़ने पर वह लेट गया और कुछ ही देर में उसकी मौके पर ही मौत हो गई।

पुलिस पहुंची, समाजसेवियों ने निभाई जिम्मेदारी

घटना की सूचना मिलते ही पुलिस गश्ती दल मौके पर पहुंचा। पुलिस के माध्यम से समाजसेवी रंजीत बसाक से संपर्क किया गया। सुबह करीब 4 बजे नंदी गौ सेवा धाम के सदस्य विकास जोतवानी ने शव और परिजनों को उनके गांव खोल्हाड पहुंचाने की व्यवस्था की।

जिम्मेदार कौन?

सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि मरीज को रेफर किया गया था तो उसे गंतव्य तक पहुंचाने की जिम्मेदारी किसकी थी? क्या अस्पताल की जिम्मेदारी रेफर पर्ची तक ही सीमित है?

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