नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी ने एक बयान कहा है कि ‘इंडिया’ ब्लॉक के गठन में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, जिन्हें नेतृत्व का जिम्मा मिला है और वे सही तरह से निभा नहीं कर पाते हैं तो ममता इंडिया गठबंधन का नेतृत्व करने के लिए तैयार हैं। ममता इसके पहले भी कई मौकों पर ‘इंडिया’ ब्लॉक का नेतत्व करने को लेकर कांग्रेस पर निशाना साधा चुकी हैं।
हाल ही में ममता बनर्जी ने कहा था कि कांग्रेस को संसद में सिर्फ अडानी का मुद्दा ही दिखता है। विपक्षी नेताओं में ममता पहली नेता हैं जिन्होंने बांग्लादेश के मुद्दे पर सकारात्मक बयान दिया है। उन्होंने कहा है कि केंद्र सरकार को बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों पर हो रहे अत्याचार के मद्देनजर संयुक्त राष्ट्र सेना की तैनाती की पहल करनी चाहिए। ममता का यह बयान तब आया है, जब कांग्रेस के वरिष्ठ लीडर मणिशंकर अय़्यर और सलमान खुर्शीद ममता बनर्जी के ठीक उलट बोल रहे हैं कि बांग्लादेश में जो कुछ हो रहा है, वह भारत में भी हो सकता है। ममता के इन दो बयानों से साफ है कि वे इंडिया ब्लॉक में कांग्रेस के स्टैंड और कामकाज से असंतुष्ट हैं।
याद रहे कि ममता बनर्जी ने कांग्रेस छोड़कर ही तणमूल कांग्रेस का गठन किया था। उनके कांग्रेस छोड़ने की वजह थी कि वे बंगाल की तत्कालीन वाम मोर्चा की सरकार के खिलाफ आवाज बुलंद कर रही थीं, लेकिन कांग्रेस नरमी बरत रही थी। ममता ने बंगाल में वाम दलों की तरह कांग्रेस को भी नेस्तनाबूद करने में कसर नहीं छोड़ी है। कांग्रेस से ममता की खुन्नस इससे समझी जा सकती है कि इंडिया ब्लॉक में रहते हुए उन्होंने लोकसभा चुनाव में कांग्रेस से कोई समझौता नहीं किया। वाम दलों की तरह कांग्रेस को किनारे कर दिया था।
साल 2021 के विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी की पार्टी को जब तीसरी बार सरकार बनाने का मौका मिला, तब ममता ने विपक्षी एकता का अभियान चलाया था। विपक्ष को एक करने की उनकी अवधारणा में कांग्रेस कहीं नहीं थी। वह यूपी के पूर्व सीएम और समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव से मिलीं। मुंबई जाकर एनसीपी के सुप्रीमो शरद पवार और शिवसेना (यूबीटी) प्रमुख उद्धव ठाकरे से उन्होंने मुलाकात की थी। दिल्ली में आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल से भी उनकी कई मुलाकातें हुई थीं। आरजेडी अध्यक्ष लालू यादव तो ममता को अपनी बहन ही बताते हैं। हेमंत सोरेन से उन्होंने बात की। आड़े वक्त हेमंत सोरेन की उन्होंने मदद भी की थी, लेकिन उनकी इन मुलाकातों-बातों में कांग्रेस का जिक्र कहीं नहीं था। यह अलग बात है कि शरद पवार की वजह से तब माहौल नहीं बन पाया। पवार ने साफ कह दिया कि कांग्रेस को छोड़ विपक्षी एकता की बात बेमानी है। 2023 में बिहार में महागठबंधन का नेता रहते नीतीश कुमार ने जब विपक्षी एकता की पहल की और ममता बनर्जी से मिलने वे कोलकाता गए तो ममता की सलाह पर ही विपक्षी नेताओं की पहली बैठक पटना में रखी गई। इसके पीछे भी उनकी राजनीतिक चाल थी। वे जानती थीं कि दिल्ली में बैठक हुई तो कांग्रेस हावी हो जाएगी। खैर, पटना की बैठक में पहली बार विपक्ष के नेता एक साथ बैठे। जब नामकरण का समय आया तो ममता ने ‘इंडिया’ नाम का समर्थन किया था।
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ममता बनर्जी इंडिया ब्लॉक में कांग्रेस के स्टैंड और कामकाज से असंतुष्ट, करेंगी नेतृत्व?
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