खबर 30 दिन न्यूज़ नेटवर्क
भारत में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और हिंदू-मुस्लिम नफरत बढ़ने के पीछे कई कारक हैं। इनमें राजनीतिक दल, धार्मिक संगठन, सोशल मीडिया और मीडिया का एक धड़ा शामिल है। लेकिन अगर बात हिंदुत्व की राजनीति की करें, तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की भूमिका पर भी चर्चा जरूरी हो जाती है।
1. आरएसएस का हिंदुत्व एजेंडा
आरएसएस एक हिंदू राष्ट्रवादी संगठन है, जिसकी स्थापना 1925 में हुई थी। इसका मुख्य उद्देश्य हिंदू समाज को संगठित करना और हिंदू संस्कृति को बढ़ावा देना है। हालांकि, इसका विचार हिंदू वर्चस्ववादी (Majoritarian) दृष्टिकोण पर आधारित रहा है, जो भारत जैसे बहुधर्मी और बहुसांस्कृतिक देश में साम्प्रदायिक तनाव का कारण बनता है।
आरएसएस की भूमिका:
- आरएसएस लगातार यह प्रचार करता आया है कि हिंदू संस्कृति खतरे में है और इसे बचाने की जरूरत है।
- संगठन के कई नेताओं और संबद्ध संगठनों ने मुसलमानों के खिलाफ बयानबाजी की है।
- बाबरी मस्जिद-विवाद में आरएसएस और इससे जुड़े संगठनों की बड़ी भूमिका रही, जिसने 1992 में सांप्रदायिक तनाव को चरम पर पहुंचा दिया।
- ‘लव जिहाद’, ‘गो हत्या’, और ‘घुसपैठ’ जैसे मुद्दों को उभारकर मुसलमानों के खिलाफ नफरत पैदा की जाती है।
2. बीजेपी का चुनावी ध्रुवीकरण
भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) का आरएसएस से गहरा संबंध है और इसका वैचारिक आधार हिंदुत्व पर टिका हुआ है। 1980 में स्थापित होने के बाद से बीजेपी ने धीरे-धीरे सांप्रदायिक राजनीति को अपने चुनावी अभियान का हिस्सा बनाया।
बीजेपी की रणनीति:
- ध्रुवीकरण वाली राजनीति:
- बीजेपी कई बार ऐसे मुद्दों को उछालती है, जिससे हिंदू-मुस्लिम विभाजन गहरा हो।
- 2014 और 2019 के चुनावों में पाकिस्तान विरोधी बयानबाजी और हिंदू राष्ट्रवाद को बढ़ावा दिया गया।
- राम मंदिर निर्माण को एक राजनीतिक मुद्दा बनाया गया, जिससे धार्मिक ध्रुवीकरण हुआ।
- मुसलमानों का हाशिए पर जाना:
- बीजेपी के शासन में मुस्लिम समुदाय को राजनीतिक और सामाजिक रूप से अलग-थलग किया गया।
- पार्टी के टिकट वितरण में मुसलमानों की हिस्सेदारी लगभग नगण्य रही।
- मॉब लिंचिंग, नागरिकता संशोधन कानून (CAA), और राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (NRC) जैसे मुद्दों से मुस्लिमों के भीतर असुरक्षा की भावना बढ़ी।
- विरोधियों को ‘मुस्लिम समर्थक’ बताना:
- बीजेपी अक्सर अपने राजनीतिक विरोधियों (कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, समाजवादी पार्टी आदि) को ‘मुस्लिम परस्त’ या ‘मुगल मानसिकता’ का करार देती है, जिससे हिंदू मतदाता बीजेपी के पक्ष में ध्रुवीकृत हो जाएं।
- शाहीन बाग आंदोलन और किसानों के प्रदर्शन को भी ‘राष्ट्रविरोधी’ और ‘जिहादी’ एजेंडे से जोड़ने की कोशिश की गई।
3. मीडिया और आईटी सेल का इस्तेमाल
बीजेपी और आरएसएस से जुड़े आईटी सेल और समर्थक मीडिया संस्थानों ने सोशल मीडिया और न्यूज चैनलों के जरिए हिंदू-मुस्लिम नफरत को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
- बीजेपी का आईटी सेल सोशल मीडिया पर लगातार हिंदू-मुस्लिम विभाजन वाले नैरेटिव को हवा देता है।
- कई गोदी मीडिया चैनल भी ऐसे डिबेट्स और खबरें प्रसारित करते हैं, जो सांप्रदायिक तनाव बढ़ाने का काम करते हैं।
4. सांप्रदायिक हिंसा और ध्रुवीकरण
बीजेपी शासित राज्यों में सांप्रदायिक हिंसा की घटनाएं ज्यादा देखी गई हैं। कई जगहों पर बीजेपी नेताओं के भड़काऊ भाषणों के बाद दंगे भड़के हैं।
- मुजफ्फरनगर दंगे (2013) – लोकसभा चुनाव से पहले हुए इन दंगों में बीजेपी नेताओं की संलिप्तता देखी गई।
- दिल्ली दंगे (2020) – नागरिकता कानून विरोधी प्रदर्शन के दौरान बीजेपी नेता कपिल मिश्रा के बयान के बाद हिंसा भड़की।
- बुलडोजर राजनीति – मुस्लिम बहुल इलाकों में बुलडोजर चलाकर समुदाय विशेष को निशाना बनाया जाता है।
निष्कर्ष
आरएसएस और बीजेपी ने हिंदू राष्ट्रवाद और मुस्लिम विरोधी नैरेटिव को बढ़ावा देकर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण किया है। राजनीतिक फायदे के लिए यह नफरत फैलाना न सिर्फ लोकतंत्र के लिए खतरा है, बल्कि सामाजिक ताने-बाने को भी कमजोर करता है। अगर भारत को आगे बढ़ाना है, तो इस नफरत की राजनीति को समझना और इसे नकारना जरूरी है। आम जनता को मिल-जुलकर रहना होगा और नफरत फैलाने वालों के खिलाफ खड़ा होना होगा।
